युद्ध के अप्रत्याशित लाभ
शांति के आर्थिक नतीजे हमेशा अच्छे नहीं होते (खासकर मुनाफाखोरों के लिए)।
आजकल यह कहानी गढ़ी जा रही है कि भारत यूक्रेन और रूस की जंग के लिए पैसे जुटा रहा है (रूस से तेल खरीदकर)। क्या कभी यूक्रेन ने भारत पर कोई शुल्क (tariff) लगाया था? फिर अमेरिका कौन होता है भारत पर शुल्क लगाने वाला? क्या वह कोई साम्राज्यवादी सुपरपावर (imperial power) है? असल बात यह है कि यूक्रेन के नाम पर लगाए जा रहे इन शुल्कों का मकसद यूक्रेन की मदद करना नहीं है। इसका असली मकसद दुनिया को यह दिखाना है कि अगर किसी ने अमेरिकी प्राथमिकताओं और उसकी दादागिरी को चुनौती दी, तो उसके बहुत गंभीर आर्थिक नतीजे भुगतने होंगे। यानी साम्राज्य पलटवार करना जानता है!
अमेरिका यूक्रेन जंग के बहाने रूस से तेल-गैस खरीदने के लिए भारत को भला-बुरा कहता है, लेकिन खुद अपनी कई जरूरी चीजों के लिए रूस के साथ अरबों डॉलर का व्यापार धड़ल्ले से कर रहा है! जंग यूक्रेन और रूस के बीच है, लेकिन अमेरिका इसमें टांग क्यों अड़ा रहा है? रूस से भारी मात्रा में गैस और तेल खरीदने वाले यूरोपीय संघ (EU) और चीन का क्या? वैसे भी, अमेरिका के साथ व्यापार घाटे (trade deficit) के मामले में भारत दसवें नंबर पर आता है। तो फिर उन बाकी नौ देशों पर भारी शुल्क क्यों नहीं लगाया गया? क्या वे भारत से ज्यादा हर्जाना भर रहे हैं?
अमेरिका का यह दोहरा रवैया कोई नया नहीं है। यह 100 साल पुराने इतिहास से चला आ रहा है, जब अमेरिका ने यूरोपीय जंगों के दौरान खुद को 'तटस्थ' (neutral) बताते हुए मित्र देशों (Allies) और नाज़ी जर्मनी दोनों के साथ जमकर व्यापार किया था। जंग से मिलने वाले अंधे मुनाफे (windfall profits) जैसा सुख दुनिया का कोई और धंधा नहीं दे सकता। अमेरिका और उसकी कंपनियां हमेशा से युद्ध की आग में रोटियां सेकती आई हैं।
महायुद्ध (1914-1918)
शुरुआत में इस जंग को 'महायुद्ध' (The Great War) या 'दुनिया की जंग' कहा जाता था। लोगों ने इसे 'महान' (Great) इसलिए कहा क्योंकि इतिहास में इतने बड़े पैमाने पर कभी कोई जंग नहीं लड़ी गई थी। लाखों सैनिकों को मोर्चे पर झोंक दिया गया, पूरे देशों की अर्थव्यवस्थाएं इसमें झुलस गईं और आधुनिक मशीनी युद्ध का एक खौफनाक रूप सामने आया।
'विश्व युद्ध' (World War) शब्द तो बहुत बाद में इतिहासकारों और पत्रकारों ने 1920 के दशक में इस्तेमाल करना शुरू किया, ताकि इसे इतिहास के छोटे-मोटे संघर्षों से अलग दिखाया जा सके और यह स्वीकार किया जा सके कि इसमें दुनिया के कई महाद्वीप और बड़े साम्राज्य शामिल थे। 1930 के दशक तक, खासकर जब दूसरे बड़े युद्ध की आहट सुनाई देने लगी, तो इसे 'प्रथम विश्व युद्ध' (World War I) कहा जाने लगा ताकि इसे 'द्वितीय विश्व युद्ध' (1939-1945) से अलग किया जा सके।
उस समय के बुद्धिजीवियों ने इसे 'बैंकरों की जंग' (Bankers' War) कहा था, क्योंकि इसे सेनापतियों या नेताओं ने नहीं, बल्कि बैंकों ने मुमकिन बनाया था—अपने बही-खातों, भारी-भरकम कर्जों और पैसों के दम पर। अगर तिजोरी में पैसा न हो, तो जंग का खर्च उठाना नामुमकिन हो जाता है।
जे.पी. मॉर्गन एंड कंपनी (J.P. Morgan & Co.) ने इस युद्ध के दौरान अकेले लंदन (ब्रिटेन) के लिए 1.5 अरब डॉलर के युद्ध कर्ज (war loans) का इंतजाम किया था। उसी पैसे से हथियार, बारूद और अनाज खरीदा गया। अगर जे.पी. मॉर्गन की यह मदद न मिलती, तो ब्रिटेन और फ्रांस 1915 में ही घुटने टेक चुके होते। अमेरिकी बैंकों ने अमेरिका के जंग में कूदने से बहुत पहले ही अपना पाला चुन लिया था—उन्होंने उस गुट का साथ दिया जिसके पास उनका कर्ज चुकाने की हैसियत थी!
जंग की शुरुआत
1914 का यूरोप बारूद के एक ऐसे ढेर पर बैठा था जिसमें आग लगने ही वाली थी। हर देश ने अपने गुप्त समझौते कर रखे थे, हर किसी के पास बड़ी फौजें थीं, और सबको गलतफहमी थी कि यह जंग बहुत छोटी होगी और वे तुरंत जीतकर सीना तानकर वापस लौटेंगे।
फिर 28 जून 1914 को ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य के राजकुमार आर्कड्यूक फ्रांज़ फर्डिनेंड और उनकी पत्नी सोफी की सारायेवो (बोस्निया) में एक सर्ब छात्र गैवरिलो प्रिंसिप ने सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी। बस कुछ ही हफ्तों के भीतर पूरे यूरोप में तबाही की आग फैल गई। ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया पर हमला बोल दिया। सर्बिया के बचाव में रूस आया। ऑस्ट्रिया-हंगरी की मदद के लिए जर्मनी उठ खड़ा हुआ। रूस का साथ देने फ्रांस कूद पड़ा। और जब जर्मनी ने बेल्जियम पर धावा बोला, तो ब्रिटेन भी जंग में शामिल हो गया।
जो लड़ाई एक छोटे से इलाके के विवाद से शुरू हुई थी, वह देखते ही देखते वैश्विक महाविनाश बन गई। लेकिन अमेरिकी बैंकरों के लिए यह आपदा भी एक सुनहरे मौके जैसी थी।
ऑस्ट्रिया-हंगरी का अजीबोगरीब साम्राज्य
ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य इतिहास के सबसे अनोखे और अजीब राजनीतिक प्रयोगों में से एक था। एक पुराना राजघराना (Habsburgs) दर्जनों अलग-अलग कबीलों, संस्कृतियों, भाषाओं और धर्मों को जबरदस्ती एक धागे में पिरोने की कोशिश कर रहा था। 1867 में वजूद में आने से लेकर 1918 में पूरी तरह बिखरने तक, यह एक संगठित देश कम और गैरेज में पुर्जे जोड़कर बनाई गई एक खटारा गाड़ी ज्यादा लगता था—जिसका आगे का हिस्सा चमचमाता हुआ था, लेकिन पीछे के पहिए खड़खड़ा रहे थे, और गाड़ी में सवार सारे यात्री स्टीयरिंग व्हील के लिए आपस में ही लड़ रहे थे!
इस साम्राज्य को 'ऑस्ट्रिया-हंगरी का दोहरा राजतंत्र' (Dual Monarchy) कहा जाता था, जो 1867 के एक समझौते (Ausgleich) के तहत बना था। इस समझौते ने हंगरी को अपने घरेलू मामलों में पूरी आजादी दे दी थी, लेकिन उनका राजा एक ही था, और उनकी विदेश नीति तथा फौज भी साझी थी।
गाड़ी के एक तरफ ऑस्ट्रियाई लोग थे—वियना के जर्मन भाषी अमीर और शाही शालीनता वाले सरकारी अफसर। दूसरी तरफ हंगेरियन (मग्यार) थे, जो बुडापेस्ट से अपना राज चलाते थे और अपनी आजादी को लेकर बेहद संवेदनशील थे।
लेकिन इस कागजी व्यवस्था के पीछे आबादी का एक ऐसा जातीय ताना-बाना (ethnic mosaic) था जो किसी को भी चकरा दे। 1910 तक इस साम्राज्य में करीब 5 करोड़ लोग रहते थे, जिसमें जर्मन और हंगेरियन मिलकर केवल 43% थे। फिर भी वे पूरी राजनीति और सत्ता पर काबिज थे। बाकी 57% आबादी में चेक, स्लोवाक, पोल, रोमानियाई, क्रोएट, सर्ब, स्लोवेन, इतालवी और यहूदियों का एक मिला-जुला जमावड़ा था। सबकी अपनी भाषा, अपने स्कूल और अपनी परंपराएं थीं, और हर कबीले के पास आजादी की मांग करने वाले अपने खुद के राष्ट्रवादी नेता थे।
सरकारी कामकाज में केवल जर्मन और हंगेरियन भाषाओं को ही तरजीह दी जाती थी, जबकि बाकी सभी भाषाओं को हाशिए पर धकेल दिया गया था। आप एक ऐसी बस की कल्पना कीजिए जिसके ड्राइवर और कंडक्टर दो अलग भाषाओं में चिल्ला रहे हैं, और अंदर बैठे यात्री आठ अन्य भाषाओं में आपस में लड़ रहे हैं, और कोई भी अपनी सीट छोड़ने को तैयार नहीं है। यही था ऑस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य!
पैसे का खेल और वॉल स्ट्रीट की तिजोरी
जे.पी. मॉर्गन एंड कंपनी ब्रिटेन और फ्रांस को ऑक्सीजन देने वाली एकमात्र वित्तीय जीवनरेखा बन चुकी थी। जंग शुरू होते ही इस बैंक ने सबसे पहले रूस को 1 करोड़ 20 लाख डॉलर का कर्ज दिया। 1915 में जब एंग्लो-फ्रेंच वित्तीय आयोग (Anglo-French Financial Commission) के साथ बातचीत हुई, तो फ्रांस और ब्रिटेन को सीधे 50 कमोश (50 करोड़) डॉलर का भारी-भरकम कर्ज दिया गया। यह आंकड़ा उस समय के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा सिंगल लोन (कर्ज) था। और यह तो बस एक शुरुआत थी।
मॉर्गन बैंक ने केवल ब्याज पर पैसा ही नहीं दिया, बल्कि वह अमेरिका के भीतर ब्रिटेन और फ्रांस का इकलौता खरीद एजेंट (purchasing agent) बन गया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जे.पी. मॉर्गन ने वॉल स्ट्रीट के इतिहास में सबसे बड़े विदेशी कर्जों का जाल बिछाया।
ब्रिटिश सेना द्वारा दागा गया हर तोप का गोला मॉर्गन बैंक के खातों से होकर गुजरता था। फ्रांसीसी सैनिकों के हाथों में मौजूद हर राइफल से मॉर्गन को अपना कमीशन मिलता था। मित्र देशों के भूखे सैनिकों के लिए अमेरिका से भेजे जाने वाले अनाज का हर एक दाना वॉल स्ट्रीट के लिए मुनाफा बटोर रहा था। 1917 तक मॉर्गन बैंक मित्र देशों को कुल 2.3 अरब डॉलर से ज्यादा का कर्ज बांट चुका था। इसके विपरीत, जर्मनी को फूटी कौड़ी भी नहीं दी गई, क्योंकि ब्रिटेन की नौसैनिक नाकेबंदी (naval blockade) ने जर्मनी तक पैसे पहुंचने के सारे रास्ते बंद कर दिए थे। और मजे की बात देखिए, अगर कोई लेखक इस सच को उजागर करता है, तो पश्चिमी मीडिया उसे तुरंत 'पक्षपाती' घोषित कर देता है!
अमेरिकी निष्पक्षता (neutrality) केवल दुनिया को दिखाने के लिए एक कागजी नाटक था। असल में, पैसा पहले ही अपना पाला चुन चुका था।
जंग में अमेरिका की एंट्री
अप्रैल 1917 में जब अमेरिका आधिकारिक तौर पर जंग में कूद पड़ा, तो बैंकों के ये निजी कर्ज रातों-रात सरकारी नीति बन गए। अमेरिकी वित्त विभाग ने अपनी सेना और मित्र देशों की सरकारों की मदद के लिए 'लिबर्टी लोन' (Liberty Loan - स्वतंत्रता ऋण) अभियान शुरू कर दिया।
1917 से 1919 के बीच कुल पांच कर्ज अभियान चलाए गए, जिनके जरिए करीब 6 करोड़ से अधिक अमेरिकी नागरिकों से 21.5 अरब डॉलर से ज्यादा का फंड जुटाया गया। राष्ट्रपति विल्सन ने पहले स्वतंत्रता ऋण कानून पर हस्ताक्षर किए, जिसने सरकार को 5 अरब डॉलर तक कर्ज लेने और उसमें से 3 अरब डॉलर मित्र देशों के कर्ज खरीदने की खुली छूट दे दी।
इस तरह जे.पी. मॉर्गन ने जो खेल शुरू किया था, उसे अब अमेरिकी सरकार ने अपने हाथ में ले लिया था। अब अमेरिकी करदाताओं के पैसे से युद्ध का वित्तपोषण (financing) होने लगा। खेल बिल्कुल साफ था: जिसके हाथ में पैसे की चाबी थी, राजनीतिक नियंत्रण भी उसी के हाथ में था।
1919 तक मित्र देशों की जीत के साथ अमेरिकी बैंकों और सरकार का लगभग 13 अरब डॉलर दांव पर लगा हुआ था—जो उस समय के पूरे अमेरिका की जीडीपी का लगभग एक-तिहाई हिस्सा था! ऐसे में अमेरिका किसी भी हाल में ब्रिटेन और फ्रांस को हारने नहीं दे सकता था, क्योंकि अगर वे हार जाते, तो अमेरिका का सारा पैसा डूब जाता।
अमेरिका का दोहरा खेल
राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने दोहरेपन का एक बेहतरीन खेल खेला। वे दुनिया के सामने तटस्थता का ढोल पीटते रहे, जबकि उनके बैंकर मित्र देशों को हथियारों से पाट रहे थे। वे शांति का उपदेश देते रहे, जबकि उनके कारखाने दिन-रात बारूद उगल रहे थे। 1916 के चुनाव में विल्सन ने एक बेहद सरल नारे पर चुनाव लड़ा—'उसने हमें जंग से दूर रखा।' अमेरिकी जनता भी इस नारे से खुश थी, क्योंकि उनके घर के बच्चे सुरक्षित थे और देश की कंपनियां हथियार बेचकर मलाई मार रही थीं।
लेकिन असल में तटस्थता तो बहुत पहले ही दम तोड़ चुकी थी। जर्मनी अमेरिकी 'निष्पक्षता' के पीछे छिपे इस सच को अच्छी तरह समझ रहा था कि यह केवल उसके दुश्मनों को परोक्ष रूप से दिया जा रहा समर्थन है। जर्मनी की नजर में अमेरिका पहले ही जंग में शामिल था, बस उसने इसका औपचारिक ऐलान नहीं किया था। विल्सन ने जब तक मुमकिन हो सका, यह ढोंग जारी रखा क्योंकि शांति का यह नाटक बेहद फायदेमंद था।
लेकिन जनवरी 1917 में पानी सिर से ऊपर चला गया। जर्मनी ने अपनी पनडुब्बियों (U-boats) को आदेश दिया कि वे ब्रिटेन जाने वाले हर जहाज को बिना किसी चेतावनी के डुबो दें, चाहे उस पर किसी भी देश का झंडा क्यों न लगा हो। इसने अमेरिकी व्यापारियों के मुनाफे और अमेरिकी नागरिकों की जान दोनों को सीधे खतरे में डाल दिया।
इसी बीच 'ज़िम्मरमैन टेलीग्राम' (Zimmermann Telegram) का भंडाफोड़ हुआ। जर्मनी ने गुपचुप तरीके से मेक्सिको को प्रस्ताव दिया था कि वह अमेरिका पर हमला कर दे, और बदले में जंग जीतने के बाद मेक्सिको को टेक्सास, एरिजोना और न्यू मेक्सिको के खोए हुए इलाके वापस दिला दिए जाएंगे!
राष्ट्रपति विल्सन को मनचाहा बहाना मिल गया। 2 अप्रैल 1917 को वे भारी-भरकम और नैतिक शब्दों के साथ अमेरिकी संसद पहुंचे। उन्होंने घोषणा की, "दुनिया को लोकतंत्र के लिए सुरक्षित बनाना ही होगा।" उन्होंने दावा किया कि अमेरिका स्वतंत्रता और न्याय की रक्षा के लिए जंग में उतर रहा है। जबकि असली वजहें बेहद व्यावहारिक थीं—अमेरिकी व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा करना, और यह पक्का करना कि ब्रिटेन और फ्रांस जंग जीतकर अमेरिकी बैंकों का एक-एक पैसा वापस चुका सकें!
जुगाड़ गाड़ी का अंत
ऑस्ट्रिया-हंगरी का युद्ध प्रयास शुरू से ही एक बड़ी तबाही था। उनकी सेना कागजों पर तो बहुत बड़ी थी, लेकिन अंदरूनी तौर पर जातीय और भाषाई विवादों से बुरी तरह बिखरी हुई थी। फौजी अफसर जर्मन या हंगेरियन में चिल्लाकर आदेश देते थे, जिसे आम सिपाही समझ ही नहीं पाते थे। सिपाहियों का मनोबल देश के प्रति नहीं, बल्कि अपने कबीले के प्रति था। आलम यह था कि चेक रेजिमेंट के सैनिक रूसियों के सामने बिना लड़े ही आत्मसमर्पण कर देते थे, क्रोएशियाई सैनिक सर्बों के खिलाफ बंदूक उठाने से कतराते थे, और रोमानियाई सैनिक सीमा पार अपने भाइयों से मिलने का सपना देखते थे।
जंग की इस मार ने ऑस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य के खोखलेपन को पूरी तरह उजागर कर दिया। जो देश बाहर से एक महाशक्ति दिखता था, वह असल में अपनी मर्जी के बिना ठूंसे गए लोगों का एक लाचार झुंड था। युद्ध ने यह साबित कर दिया कि यह जुगाड़ गाड़ी किसी देशभक्ति से नहीं, बल्कि केवल पुरानी आदत और मजबूरी के सहारे घिसट रही थी।
1916 में सम्राट फ्रांज़ जोसेफ की मौत हो गई और उनकी जगह उनके परपोते कार्ल प्रथम ने गद्दी संभाली, लेकिन उनके पास न तो कोई करिश्मा था और न ही प्रशासनिक पकड़। गाड़ी के पहिए खड़खड़ाने लगे और यात्री एक-एक करके नीचे कूदने लगे। दबाव बढ़ते ही यह जुगाड़ गाड़ी बीच रास्ते में ही बिखर गई।
देश के भीतर अकाल पड़ गया और अनाज की भारी किल्लत हो गई। साम्राज्य की सेना का साझी पहचान का भ्रम पूरी तरह टूट गया। कल तक गर्व करने वाली हैब्सबर्ग सेना अब केवल कागजी रेजिमेंटों का एक बेजान पैचवर्क बनकर रह गई थी।
साम्राज्यों का खात्मा
1918 के अंत तक ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य का पूरी तरह से अंत हो चुका था। चेक और स्लोवाक लोगों ने मिलकर 'चेकोस्लोवाकिया' बना लिया। सर्ब, क्रोएट और स्लोवेन कबीलों ने मिलकर 'यूगोस्लाविया' का निर्माण किया। रोमानिया ने ट्रांसिल्वेनिया पर कब्जा कर लिया और पोलैंड ने गैलिसिया का इलाका वापस छीन लिया।
11 नवंबर 1918 को जब युद्धविराम के समझौते पर दस्तखत हुए, तब तक नक्शे से ऑस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य का नामोनिशान मिट चुका था। जो साम्राज्य जंग की शुरुआत में 5 करोड़ की आबादी वाली महाशक्ति था, वह अब केवल दो छोटे और बंजर देशों (ऑस्ट्रिया और हंगरी) में सिमट कर रह गया, जिनके पास न तो कोई समुद्री रास्ता था और न ही कोई रसूख।
लेकिन जर्मनी का हश्र इससे भी बुरा हुआ। 'वर्साय की संधि' (Treaty of Versailles) के तहत जर्मनी पर युद्ध का सारा दोष मढ़ दिया गया और उस पर 132 अरब स्वर्ण अंक (gold marks) का भारी हर्जाना ठोक दिया गया—यह रकम जर्मनी की सालाना जीडीपी से तीन गुना ज्यादा थी! संधि के तहत जर्मनी के कई महत्वपूर्ण हिस्से छीन लिए गए। अल्सेस-लोरेन फ्रांस को दे दिया गया, पोलिश कॉरिडोर बनाकर जर्मनी के एक हिस्से को अलग कर दिया गया और राइनलैंड को पूरी तरह निःशस्त्र (demilitarized) कर वहां मित्र देशों की सेना तैनात कर दी गई।
इस अपमान और पंगु हो चुकी अर्थव्यवस्था ने जर्मनी के भीतर एक गहरे गुस्से को जनम दिया, जिसने आगे चलकर हिटलर जैसे तानाशाह और एक नए महाविनाश (द्वितीय विश्व युद्ध) की नींव रखी।
पश्चिमी देश आज भी भारत को इसी नीच लालसा से देखते हैं, जैसे कोई ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य के टूटने की प्रतीक्षा कर रहा हो—वे चाहते हैं कि भारत जैसा बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश भी टुकड़ों-टुकड़ों में बिखर जाए। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि भारत की तमाम विविधताओं के भीतर संस्कृत और हमारी महान सांस्कृतिक विरासत की एक अटूट साझी धारा बहती है, जो इसे हमेशा एक सूत्र में बांधे रखती है।
असली विजेता
जब मोर्चों पर लाखों गरीब सिपाही दम तोड़ रहे थे और बड़े-बड़े साम्राज्य ढह रहे थे, तब वॉल स्ट्रीट के बैंकर अपने दफ्तरों में बैठकर मुनाफा गिन रहे थे। जे.पी. मॉर्गन ने पहले ही दिन से जीतने वाले पाले पर दांव लगाया था, और उनका पूरा पैसा सूद समेत वापस मिल गया।
इस युद्ध ने दुनिया की पूरी दौलत को यूरोप की पुरानी दुनिया से निकालकर अमेरिका की नई दुनिया में ट्रांसफर कर दिया, और अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी वित्तीय महाशक्ति बनकर उभरा।
लंदन को पछाड़कर न्यूयॉर्क का वॉल स्ट्रीट दुनिया के वित्त का नया हेडक्वार्टर बन गया। 1913 में स्थापित हुए अमेरिकी 'फेडरल रिजर्व' (Federal Reserve) ने अमेरिकी डॉलर के इस दबदबे को संस्थागत रूप दिया। यह फेडरल रिजर्व ही था जिसने आम अमेरिकी करदाताओं को कानोकान खबर हुए बिना, उनके पैसों से मित्र देशों को 25 अरब डॉलर का कर्ज बांट दिया था। बाद में कई देश यह कर्ज चुका नहीं पाए, जिसका हर्जाना अंततः अमेरिकी जनता को महंगाई और करों के रूप में भुगतना पड़ा, जबकि बैंकरों ने ब्याज और कमीशन से अपनी तिजोरियां भर लीं!
इस युद्ध ने आने वाली पूरी सदी के लिए एक नया ढर्रा तय कर दिया—राजनीतिक नियंत्रण से पहले हमेशा वित्तीय नियंत्रण आता है। जिसने दुनिया के पैसे की चाबी पर कब्जा कर लिया, उसने हर जंग के नतीजों को भी मुमकिन बना दिया। बैंकरों को समझ आ गया था कि तोपों और युद्धपोतों से जंग लड़ना गंदा और खर्चीला काम है, लेकिन कर्ज के कागजातों से वही नतीजे बिना खून बहाए और कहीं ज्यादा मुनाफे के साथ हासिल किए जा सकते हैं!
युद्ध का नया बिजनेस मॉडल
प्रथम विश्व युद्ध ने यह साबित कर दिया कि जंग उन लोगों के लिए सोने की खान है जो जंग की तैयारी से लेकर बर्बादी के बाद उसके पुनर्निर्माण (reconstruction) तक को फाइनेंस करते हैं। बैंकरों को मुनाफे का एक जादुई फार्मूला मिल चुका था।
सरकारों को हथियारों और फौज के लिए हमेशा पैसों की जरूरत होती है और वे इसके लिए कोई भी ब्याज दर चुकाने और अपनी राष्ट्रीय संपत्तियां गिरवी रखने को तैयार हो जाती हैं। यहां कर्ज डूबने का भी कोई खतरा नहीं होता, क्योंकि हारने वाले देशों की जमीन और उनके प्राकृतिक संसाधनों को बेचकर कर्ज वसूल किया जा सकता है।
बैंकरों को समझ आ गया कि केवल पैसा उधार देना काफी नहीं है, बल्कि खुद जंग को फाइनेंस करना एक बड़ा धंधा है। वे पहले जंग की तैयारी के लिए सरकारों को कर्ज देंगे, फिर जंग लड़ने के लिए कर्ज देंगे, और अंत में मलबे में तब्दील हो चुके देशों को दोबारा खड़ा करने के लिए कर्ज बांटेंगे! हर एक कदम पर भारी मुनाफा तय था। इस चक्र को तब तक अनिश्चित काल तक चलाया जा सकता था, जब तक कि दुनिया में जंग का माहौल और तनाव बना रहे।
यही वजह है कि दुनिया के असली फैसले कभी जंग के मैदान में नहीं, बल्कि बंद कमरों में बैंकरों की मीटिंगों में लिए जाते हैं। बैंकरों ने दुनिया की तबाही से मुनाफा कमाना सीख लिया था, और वे इसे रोकने वाले नहीं थे। तो फिर आज यूक्रेन जंग के असली 'बैंकर' कौन हैं?
यूक्रेन जंग के आज के 'बैंकर'
आज यूक्रेन जंग में भी मुनाफाखोरी का वही पुराना खेल खेला जा रहा है, बस इसके खिलाड़ी थोड़े बदल गए हैं:
- अमेरिकी रक्षा ठेकेदार (Defense Contractors): लॉकहीड मार्टिन (Lockheed Martin), रेथियॉन (Raytheon) और नॉर्थ्रॉप ग्रुम्मन (Northrop Grumman) जैसी हथियार बनाने वाली कंपनियां। यूक्रेन भेजे जाने वाले हथियारों के बदले इन्हें अमेरिकी सरकार से सीधे नकद भुगतान मिलता है।
- इन्वेस्टमेंट बैंक और एसेट मैनेजर: ब्लैकरॉक (BlackRock) जैसी विशाल कंपनियों को यूक्रेन के पुनर्निर्माण पर सलाह देने के लिए नियुक्त किया गया है। जेपीमॉर्गन (JPMorgan) जैसे बैंक यूक्रेन के सरकारी बॉन्ड और उसकी फंडिंग संभाल रहे हैं। ये पश्चिमी कंपनियां जंग के बाद यूक्रेन की संपत्तियों पर कब्जे की तैयारी में जुटी हैं।
- अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान (IMF & World Bank): आईएमएफ यूक्रेन को कड़ी शर्तों पर कर्ज दे रहा है, जिसका भुगतान अंततः यूक्रेन के गरीब करदाताओं को अपनी जेब से करना होगा।
- कमोडिटी ट्रेडर्स (Commodity Traders): कच्चे तेल, गैस, अनाज और उर्वरकों की कीमतों में उतार-चढ़ाव से भारी मुनाफा कमाने वाले बिचौलिए।
- प्राइवेट फंड्स (Hedge Funds): यूक्रेन की तबाही का फायदा उठाकर उसकी कौड़ियों के दाम मिल रही संपत्तियों और कर्ज को खरीदने वाले शातिर इन्वेस्टर्स।
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