साम्राज्य की घोषणा
"सत्ता की परम चतुराई वह है जब पीड़ित स्वयं अपनी दासता बनाए रखते हैं।"
फिलीपींस में नस्लीय श्रेष्ठता की नैतिक नींव स्थापित होने और प्रथम विश्वयुद्ध में रणनीतिक ढांचे के परिष्कृत होने के बाद अमेरिका मानव इतिहास के सबसे बड़े छल को रचने की स्थिति में था। द्वितीय विश्वयुद्ध केवल एक और संघर्ष नहीं था बल्कि समस्त प्रतिद्वंद्वी शक्ति केंद्रों का व्यवस्थित विनाश था। यह सब मिलकर इतिहास के प्रथम कागजी साम्राज्य में परिणत हुआ — भूभागीय अधिग्रहण के बजाय मौद्रिक नियंत्रण के माध्यम से वैश्विक प्रभुत्व।
यदि आप सोच रहे थे कि राष्ट्रपति ट्रंप ने रक्षा विभाग का नाम बदलकर युद्ध विभाग क्यों किया तो अब आप समझ सकते हैं। युद्ध गौरवशाली है। युद्ध लाभदायक है। युद्ध प्रतिष्ठा बनाता है। किंतु ट्रंप को विश्व को यह बताना होगा कि अगला युद्ध कौन लड़ेगा। अमेरिकी अपने बच्चों के शव-संदूकों से थक चुके हैं।
साम्राज्य में रूपांतरण के लिए अभूतपूर्व समन्वय आवश्यक था। शत्रु का निर्माण करने के लिए निगमीय सहयोग (Corporate cooperation), प्रतिद्वंद्वियों के अधिकतम परस्पर विनाश को सुनिश्चित करने के लिए रणनीतिक समय-निर्धारण, मनोवैज्ञानिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए परमाणु आतंक और स्थायी अमेरिकी लाभ को सुरक्षित करने के लिए वित्तीय ढांचा।
न्यू हैम्पशायर के उस साधारण होटल में जहाँ यह नई विश्व व्यवस्था रची गई इस परिष्कार का सटीक प्रतिबिंब था — साम्राज्यवादी दिखने के बजाय सहयोगी प्रतीत होते हुए सभ्यता को नए सिरे से ढाला गया।
यूरोप की थकान
युद्ध ने ब्रिटेन को वित्तीय रूप से तबाह कर दिया और उसे अमेरिकी वित्तपोषण पर निर्भर बना दिया। वह अपने साम्राज्य को बनाए रखने में असमर्थ हो गया। पाउंड स्टर्लिंग का डॉलर द्वारा विस्थापन सदियों पुरानी ब्रिटिश वित्तीय सर्वोच्चता का अंत था।
फ्रांस, जर्मनी और इटली खंडहर में पड़े थे। उनकी औद्योगिक क्षमता नष्ट हो चुकी थी, जनसंख्या थकी-हारी थी और सरकारें पुनर्निर्माण के लिए अमेरिकी सहायता पर आश्रित थीं। वित्तीय रूप से अमेरिकी समर्थन के बिना यूरोपीय औपनिवेशिक साम्राज्यों को बनाए रखना असंभव था।
राष्ट्र संघ का पतन
राष्ट्र संघ की विफलता ने अमेरिकी-अभिकल्पित प्रतिस्थापन संस्थाओं के लिए आदर्श औचित्य प्रदान किया। अमेरिकी भागीदारी के बिना प्रथम विश्वयुद्ध के बाद बना यह संघ यूरोपीय नेतृत्व में वैश्विक शासन का अंतिम प्रयास था। यह संघर्षों को रोकने में व्यवस्थित रूप से विफल रहा — मंचूरिया पर जापानी आक्रमण (1931), इथियोपिया की इतालवी विजय (1935-36) और राइनलैंड के जर्मन पुनः सैन्यीकरण (1936) को रोकने में। इसने वैश्विक व्यवस्था बनाए रखने में यूरोप की असमर्थता सिद्ध कर दी। अमेरिका ने राष्ट्र संघ को विफल होने दिया और साथ ही आने वाले युद्ध को बढ़ावा देने वाले आर्थिक संबंध बनाता रहा।
1939 तक यूरोप के पूर्ण आत्मविनाश का मंच तैयार था और अमेरिका उस एकमात्र शक्ति के रूप में उभरने की स्थिति में था जो नई वैश्विक संस्थाएं बना सके। राष्ट्र संघ का पतन दुर्घटना नहीं था बल्कि सुनियोजित व्यवस्था थी। यह निष्क्रिय दर्शन नहीं बल्कि सक्रिय छल था जिसने यूरोपीय संस्थाओं को ध्वस्त कराया और अमेरिका को अपरिहार्य विकल्प के रूप में स्थापित किया। इसने अमेरिकी हितों की पूर्ति करने वाले ढांचे के लिए खुला मैदान तैयार किया।
इतिहास की पुनरावृत्ति (दोबारा होना)
द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका का प्रवेश प्रथम विश्वयुद्ध में स्थापित उसी परिष्कृत प्रतिरूप का अनुसरण करता था — अनिच्छुक दिखते हुए न्यूनतम लागत पर अधिकतम रणनीतिक लाभ के लिए हस्तक्षेप का सही समय चुनना। यह तीन चरणों में खेला गया।
चरण 1: नियंत्रित उत्प्रेरण (Controlled trigger) (1939-1941)
यूरोपीय युद्ध: पोलैंड पर जर्मनी के आक्रमण ने यूरोपीय युद्ध को ठीक वैसे भड़काया जैसा अमेरिकी रणनीतिक योजनाकारों ने अनुमान लगाया था। जर्मन सैन्य क्षमता में निगमीय निवेश ने सुनिश्चित किया कि जर्मनी यूरोप को तबाह करने के लिए पर्याप्त शक्तिशाली होगा किंतु अंततः अमेरिकी हस्तक्षेप के प्रति असुरक्षित भी रहेगा।
लेंड-लीज कार्यक्रम (Lend-Lease Program) परिष्कृत छल का प्रतिनिधित्व करता था। इसे सहयोग के रूप में प्रस्तुत किया गया — आपूर्ति और उपकरण ऋण के आधार पर दिए गए जो युद्ध के बाद लौटाए जाने थे। यह संकटग्रस्त लोकतंत्रों की मानवीय सहायता के रूप में दिखाया गया जबकि वास्तव में इसने कई अमेरिकी रणनीतिक हित पूरे किए — ब्रिटेन को जर्मन संसाधनों को खींचते रहने के लिए लड़ाए रखा और अमेरिका के प्रति विशाल यूरोपीय ऋण बनाए जबकि उदार दिखता रहा।
आदर्श उकसावा: पर्ल हार्बर ने अमेरिकी प्रवेश के लिए आदर्श नैतिक औचित्य दिया किंतु समय अमेरिकी हितों के लिए सर्वोत्तम था। उस समय तक जर्मनी रूस के विरुद्ध पूर्वी मोर्चे पर पूरी तरह उलझ चुका था। यूरोपीय शक्तियां तबाह हो चुकी थीं और उनकी सेनाएं थकी हुई थीं। जापान प्रशांत क्षेत्र में अपनी क्षमता से अधिक फैल चुका था। अमेरिकी औद्योगिक और सैन्य क्षमता पूरी तरह संगठित होकर अधिकतम प्रभाव के लिए तैयार थी।
चरण 2: रणनीतिक संचालन (1941-1944)
रूस का रक्त-बलिदान: सोवियत संघ ने लगभग 2 करोड़ 70 लाख लोग खोए जो समस्त मित्र राष्ट्रों की हानि में सर्वाधिक था। अमेरिका ने 4,18,500 खोए। यह आकस्मिक असंतुलन नहीं था बल्कि एक रणनीतिक गणना थी। अमेरिका अपने नागरिकों को मारे जाने से बचाने में सफल रहा।
द्वितीय मोर्चे में विलंब: अमेरिका ने जानबूझकर यूरोप में द्वितीय मोर्चे को 1944 तक विलंबित किया ताकि जर्मनी और रूस एक-दूसरे को थकावट तक रक्तरंजित करते रहें। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि सोवियत सेनाएं पूर्वी यूरोप की सफाई में अधिकतम हताहत उठाएं। सोवियत थकावट युद्धोत्तर अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देने से रोकती और अमेरिकी हस्तक्षेप अवसरवादी के बजाय निर्णायक दिखता।
प्रशांत द्वीप रणनीति: व्यवस्थित द्वीप-दर-द्वीप अभियान ने दोहरे उद्देश्य पूरे किए। इसने अमेरिकी औद्योगिक और रसद श्रेष्ठता का प्रदर्शन किया। सेनाओं की स्थिति अमेरिकी शक्ति का चरम प्रदर्शन था। इसने जापानी संसाधनों को थकाया और अंतिम प्रदर्शन की गति बनाई।
चरण 3: परमाणु आतंक और वैश्विक समर्पण (1945)
हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु बमबारी व्यवस्थित नागरिक निशाना-साधन था जिसकी कोई सैन्य आवश्यकता नहीं थी। जापान पहले से ही सोवियत माध्यमों से आत्मसमर्पण की मांग कर रहा था किंतु अमेरिका को विश्व के सामने शक्ति का चरम प्रदर्शन करना था। परमाणु आतंक के रणनीतिक उद्देश्य ये थे:
सोवियत संघ पर मनोवैज्ञानिक प्रभुत्व स्थापित करना। अंधाधुंध सामूहिक हत्या के लिए अमेरिकी तत्परता का प्रदर्शन। विश्व को अमेरिकी वैश्विक नेतृत्व स्वीकार करने के लिए आतंकित करना। स्थायी अमेरिकी लाभ की नींव के रूप में परमाणु एकाधिकार बनाना।
मीडिया का आख्यान
साम्राज्य की छवि-निर्माण में मीडिया की भूमिका को कम नहीं आंका जा सकता। उसने एक परोपकारी सत्ता की छवि बनाई जिसका एकमात्र उद्देश्य संपूर्ण मानवता की सेवा था। यह छवि चौबीसों घंटे अनवरत चमकाई जाती रही। उसके कुछ अभियान इस प्रकार थे:
कामिकाज़े का छल: अमेरिकी मीडिया ने कामिकाज़े हमलों को जापानी कट्टरता के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया और 4,000 आत्मघाती पायलटों का उपयोग 2,00,000 से अधिक नागरिकों की हत्या के औचित्य के रूप में किया। इस तार्किक बेतुकेपन की कभी परीक्षा नहीं हुई कि पराजित शत्रु की हताश अंतिम-प्रयास की रणनीति परमाणु नरसंहार को उचित ठहराती है। इसने "युद्ध शीघ्र समाप्त करके जीवन बचाने" का आख्यान बेचा। इस औद्योगिक स्तर के आख्यान नियंत्रण ने तत्कालीन नैतिक प्रतिक्रिया को रोका और अमेरिकी परमाणु धमकियों के लिए एक पूर्वदृष्टांत स्थापित किया।
ब्रेटन वुड्स का आवरण: प्रेस ने डॉलर के वर्चस्व (Hegemony) की स्थापना को अमेरिकी वित्तीय विजय के बजाय अंतरराष्ट्रीय सहयोग के रूप में प्रस्तुत किया। मौद्रिक ढांचे की जटिलता ने अमेरिकी आर्थिक हितों के लिए बनाए जा रहे व्यवस्थित लाभ को अस्पष्ट कर दिया।
मार्शल योजना: युद्धोत्तर यूरोपीय पुनर्निर्माण को रणनीतिक निवेश के बजाय अमेरिकी उदारता के रूप में प्रस्तुत किया गया। प्रेस ने ऋण-वित्तपोषित पुनर्निर्माण को मानवीय सहायता के रूप में बेचा जबकि बनाए जा रहे स्थायी उत्तोलन (Leverage) को नजरअंदाज किया।
संयुक्त राष्ट्र की वैधता: संयुक्त राष्ट्र जो अमेरिकी वीटो शक्ति और अमेरिकी-वर्चस्व (Hegemony) वाली सुरक्षा परिषद के साथ अभिकल्पित था उसे अमेरिकी-नियंत्रित वैश्विक शासन के बजाय सामूहिक सुरक्षा के रूप में प्रस्तुत किया गया। प्रेस ने संस्थागत ढांचे में बनी व्यवस्थित असमानता को नजरअंदाज करते हुए अमेरिकी वैश्विक नेतृत्व को वैध बनाया।
डॉलर का वर्चस्व (Hegemony): 1945 तक परमाणु आतंक और वित्तीय ढांचे के संयोजन ने वह हासिल कर लिया था जो कोई पूर्ववर्ती साम्राज्य नहीं कर सका — थकी हुई प्रतिद्वंद्वी शक्तियों और आतंकित जनसंख्याओं का अमेरिकी प्रभुत्व के प्रति स्वैच्छिक समर्पण।
साम्राज्य की वैश्विक स्वीकृति
नव-स्वतंत्र राष्ट्रों ने अपने आप को एक ऐसी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में जन्मा पाया जो अमेरिकी लाभ सुनिश्चित करने के लिए रची गई थी। विकास वित्तपोषण तक पहुंच के लिए अमेरिकी-नियंत्रित संस्थाओं और अमेरिकी-पसंद आर्थिक नीतियों की स्वीकृति आवश्यक थी। वैश्विक आरक्षित मुद्रा के रूप में डॉलर की भूमिका का अर्थ था कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए अमेरिकी-नियंत्रित वित्तीय प्रणालियों में भागीदारी अनिवार्य थी। अस्वीकृति का अर्थ था वैश्विक वाणिज्य से बहिष्कार — किसी भी विकास-आकांक्षी राष्ट्र के लिए एक असंभव विकल्प।
कागजी साम्राज्य किसी भी भूभागीय साम्राज्य से अधिक टिकाऊ सिद्ध हुआ क्योंकि इसने प्रतिरोध को असंभव और अनैतिक दोनों दिखाया। विश्व ने नए साम्राज्य के सामने विजय के माध्यम से नहीं बल्कि स्पष्ट सहयोग के माध्यम से समर्पण किया। इसने ऐसी नियंत्रण प्रणाली बनाई जो पूर्ववर्ती किसी भी साम्राज्य से अधिक संपूर्ण थी जबकि अपनी प्रजा के लिए स्वतंत्रता और संप्रभुता का आवरण बनाए रखा। यह तब तक था जब 2025 में राष्ट्रपति ट्रंप ने लोहे की मुट्ठी से मखमली आवरण हटा दिया किंतु वह लोहा अब दूसरों का गला घोंटने के लिए बहुत जंग खा चुका है।
सोवियत पायरिक असहमति (Pyrrhic dissent): पूर्वी यूरोप में भूभागीय लाभ के बावजूद सोवियत संघ जिसने लाखों लोगों की जानें गंवाई थीं अब एक ऐसे अमेरिका के सामने था जिसके पास परमाणु हथियार, अक्षुण्ण औद्योगिक क्षमता और वैश्विक वित्त पर नियंत्रण था। वह अमेरिकी साम्राज्य की स्वीकृति पर असहमति जताने वाला एकमात्र स्वर बना रहा। शीत युद्ध इसी अमेरिकी लाभ की स्थिति से शुरू हुआ। सोवियत संघ बाद में अपने ही बोझ तले ढह गया जिस पर हम एक बाद के अध्याय में विचार करेंगे। किंतु उससे पहले हमें साम्राज्य के निर्माण के अगले चरण को समझना होगा — सोने में भुगतान की बाध्यता से मुक्ति।
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