मुस्कुराते विश्वासघात*
झूठ, घिनौने झूठ और राष्ट्रपति के झूठ।
रिचर्ड बार्लो मॉन्टाना के एक रजत रंगे ट्रेलर में रहते हैं, किराना पहाड़ियों जैसी खाइयों के निकट। वे मॉन्टाना की खाइयों की गोद में खो जाना चाहते थे। उसी समय पाकिस्तान की किराना पहाड़ियाँ उस खतरे को अपनी गोद में छिपाए थीं जिसकी चेतावनी बार्लो ने दशकों पहले दी थी।
बार्लो अमेरिकन स्पिरिट तंबाकू से एक और सिगरेट बनाते हैं और ट्रेलर की खिड़की से शून्य दृष्टि से बाहर ताकते हैं। मन में प्रश्न है — क्या यह सब सार्थक था? उनके शिकारी कुत्ते ही अब उनके एकमात्र साथी हैं। वे अभी भी सिंडी को याद करते हैं। यह विश्वास करना कठिन है कि इस इंसान ने कभी डिक चेनी को गोपनीय जानकारी दी थी और ओवल कार्यालय के लिए रिपोर्टें तैयार की थीं। जब उन्होंने पाकिस्तान को परमाणु बम दिलाने की साज़िश उजागर की, तो उनका जीवन तबाह हो गया। अब वे एक ऐसे इंसान हैं जो भीड़ में गुम हो जाना चाहते हैं। शिकार बंद हो गया, पर पीछा नहीं।
सीआईए के परमाणु तस्करी के सबसे बड़े विशेषज्ञ बार्लो एक ट्रेलर में क्यों रह रहे थे? वे गरीब नहीं थे। कांग्रेस ने उन्हें लाखों डॉलर दिए थे। उन्होंने सामूहिक विनाश के हथियारों [Weapons of Mass Destruction - WMD] के व्यापारियों का पर्दाफाश किया था। उन्होंने सरकार के सर्वोच्च स्तरों के लिए गुप्तचर आकलन [Intelligence assessment] तैयार किए थे। बार्लो की कहानी चार दशकों में फैली है। यह दक्षिण एशिया में अभी घट रही घटनाओं से जुड़ती है। यह उन झूठों की कहानी है जो अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने वर्ष दर वर्ष कांग्रेस और जनता से बोले। भारत के साथ मैत्री और सद्भाव का नाटक करते हुए उन्होंने भारत की पीठ में छुरा घोंपा। उन्हें परवाह नहीं थी कि परमाणु युद्ध में लाखों लोग मरें, जब तक अमेरिकी धरती सुरक्षित रहे।
जो लोग वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के झूठों से चिंतित हैं, उन्हें व्हाइट हाउस की उस परंपरा को ध्यान से पढ़ना चाहिए जिसमें सच सामने आने पर हमेशा झूठ बोला जाता है। और यह भी कि उन झूठों को बनाए रखने के लिए किस तरह आम लोगों की जिंदगियाँ बर्बाद की गईं।
यह ऐसे ही एक बर्बाद इंसान, रिचर्ड बार्लो, की नाटकीय कहानी है।
आदर्शवादी
रिच बार्लो संयुक्त राष्ट्र भवन की परछाईं में पले-बढ़े। उनके पिता सेना के शल्य चिकित्सक थे जो सेवा में विश्वास रखते थे। जब दूसरे परिवार खाने की मेज पर बेसबॉल की बात करते, बार्लो परिवार भू-राजनीति पर चर्चा करता। क्यूबा मिसाइल संकट। हथियारों की होड़। कहीं कोई बटन दबा देगा, यह असली डर। युवा रिच व्यग्र हो उठा। हथियारों से नहीं, बल्कि इस सवाल से कि उनके प्रसार को कैसे रोका जाए।
वे किसी आइवी लीग विश्वविद्यालय के लायक प्रतिभाशाली थे, लेकिन उन्होंने वेस्टर्न वाशिंगटन विश्वविद्यालय चुना। दुनिया को समझना था, उसकी सीढ़ियाँ नहीं चढ़नी थीं।
उनके स्नातक शोध-प्रबंध का विषय था — प्रतिप्रसार गुप्तचर [Counter-proliferation intelligence]। उन्होंने सरकारी अधिकारियों से साक्षात्कार नहीं लिया। वे सार्वजनिक पुस्तकालय गए। समाचार-पत्र, पुस्तकें, कोई भी देख सकता था ऐसी संसदीय सुनवाइयाँ। उन्होंने अपने प्राध्यापकों से कहा, "परमाणु सामग्री की खरीद-फरोख्त करने वाले देशों के बारे में ढेर सारी खुफिया जानकारी सार्वजनिक अभिलेखों में पड़ी है। इन बिंदुओं को आपस में जोड़ने वाला कोई क्यों नहीं है?"
नौकरी
1981 में रीगन राष्ट्रपति बने। शीत युद्ध [Cold War] फिर तेज हो रहा था। राजनीति विज्ञान में स्नातक कर चुके रिच बार्लो को विदेश विभाग की शस्त्र नियंत्रण और निरस्त्रीकरण एजेंसी [ACDA - Arms Control and Disarmament Agency] में इंटर्नशिप मिली। यह एजेंसी 1960 के दशक में जॉन एफ. कैनेडी ने उसी खतरे को रोकने के लिए स्थापित की थी जिससे बार्लो सबसे अधिक डरते थे।
पहले दिन 27 साल के बार्लो अपने हाथलिखे नोट्स से भरी एक पुरानी डायरी लेकर इमारत में दाखिल हुए। बाद में उन्होंने याद किया, "मुझे यह काम बहुत पसंद आया।" उन्हें लगा वे दुनिया को सुरक्षित रखने में मदद करेंगे।
पहले दिन से ही उनका ध्यान पाकिस्तान पर था। वह देश जिसने अपने पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को सिर्फ दो साल पहले फाँसी दी थी। तीस साल से कम में तीन सैन्य तख्तापलट। वही देश जिसके बारे में भुट्टो ने शपथ ली थी कि पाकिस्तान घास खाकर भी इस्लामी बम बनाएगा।
बार्लो ने बाद में याद किया, "जहाँ भी नजर जाती, पाकिस्तान के सामूहिक विनाश कार्यक्रम के बारे में खुफिया जानकारी मिलती। मुझे लगता था कि मैं वही बता रहा हूँ जो सुनने की जरूरत है।"
लेकिन व्हाइट हाउस सुनना नहीं चाहता था। बार्लो बड़ी तस्वीर नहीं देख पा रहे थे। वे प्रापण नेटवर्कों [Procurement networks - अवैध खरीद के नेटवर्क] और दोहरे उपयोग वाले उपकरणों [Dual-use equipment - ऐसे उपकरण जो नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों में काम आ सकें] के तकनीकी ब्यौरे में इतने डूबे थे कि असली खेल उनकी नजर से ओझल था।
रीगन के शपथ लेते ही पाकिस्तान बहिष्कृत राष्ट्र से अमेरिका का सबसे अहम सहयोगी बन गया था। 1979 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर आक्रमण किया था। पाकिस्तान मुजाहिदीन तक हथियार और धन पहुँचाने का गलियारा था। यह प्रॉक्सी युद्ध शीत युद्ध [Cold War] जीतने का रास्ता था।
बार्लो की जाँच बार-बार एक असुविधाजनक तथ्य की ओर इशारा करती थी — पाकिस्तान अमेरिकी धन से और अमेरिकी कंपनियों से खरीदे उपकरणों से बम बना रहा था। यह सब उन्हीं अमेरिकी अधिकारियों की नाक के नीचे हो रहा था जो उन उपकरणों के निर्यात लाइसेंस मंजूर कर रहे थे।
कनेक्टिकट, 1981–1984
कुछ ही महीनों में बार्लो की नौकरी चली गई।
पॉल वोल्फोविट्ज़ जैसे रिपब्लिकन बाज़ों [Republican hawks - रिपब्लिकन पार्टी के आक्रामक/युद्ध-समर्थक नेता] के एक छोटे गुट ने रीगन को मना लिया था कि एसीडीए [ACDA] अप्रासंगिक हो चुकी है। शीत युद्ध [Cold War] की नीतियाँ काम नहीं कर रही थीं। अमेरिका को फिर से सैन्य ताकत बनानी थी। स्टार वार्स कार्यक्रम [Star Wars program - सामरिक रक्षा पहल (Strategic Defense Initiative / SDI)] शुरू करना था। एजेंसी के एक तिहाई कर्मचारी निकाल दिए गए।
बार्लो कनेक्टिकट में एक किराना दुकान में सामान की अलमारियाँ भरने लगे और सोचते रहे कि कहाँ गलत हुआ। वहीं सिंडी से मुलाकात हुई, या शायद वे पहले से उनकी प्रेमिका थीं — यादें धुंधली हो जाती हैं। उन्होंने शादी की। सिंडी व्यावहारिक थीं जहाँ बार्लो आदर्शवादी। उन्होंने कहा, इसे छोड़ो, कोई और रास्ता ढूँढो।
लेकिन रिच बार्लो नहीं छोड़ सके। 1984 में जब वे डिब्बों पर कीमत लगा रहे थे, तब एसीडीए [ACDA] और सीआईए [CIA] तक खबर पहुँची कि पाकिस्तान परमाणु क्लब में शामिल हो गया है। चीन ने पाकिस्तान की ओर से एक परमाणु परीक्षण किया था। जो दुःस्वप्न बार्लो चिल्ला-चिल्लाकर बता रहे थे, वह सच हो गया था। लेकिन वाशिंगटन को कोई फर्क नहीं पड़ा।
वर्जीनिया, 1985
1985 में 31 साल की उम्र में बार्लो को फोन आया। सीआईए ने बुलाया था। इस बार इंटर्न के रूप में नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और हथियार अनुसंधान कार्यालय में पाकिस्तान-विशेषज्ञ विश्लेषक के रूप में।
वे और सिंडी वर्जीनिया आ गए। घर खरीदा। सिंडी भी सीआईए में नौकरी मिली, अलग विभाग में। दोनों को अत्यंत गोपनीय सामग्री देखने की अनुमति थी। वे अदृश्य दुनिया के एक शक्तिशाली दंपति थे।
पहले दिन ही बार्लो को ऐसी फाइलें मिलीं जिनके सामने उनका शोध-प्रबंध बच्चों के होमवर्क जैसा लगा। इस्लामाबाद के पास खान अनुसंधान प्रयोगशालाओं [Khan Research Laboratories - KRL] के नक्शे। सेंट्रीफ्यूज और बम के नक्शों की तस्वीरें। सुविधा की ओर जाने-आने वाले ट्रकों की धूल में संवर्धित यूरेनियम [Enriched uranium] के संकेत देते सेंसर की रिपोर्टें।
बार्लो ने पाया, "पाकिस्तान के पास दुनिया भर में फैला एजेंटों का एक विशाल नेटवर्क था।" ग्रे मार्केट [Grey market - अनौपचारिक या अर्ध-कानूनी बाजार], यानी दोहरे उपयोग के उपकरण [Dual-use equipment] और सामान जो सेंट्रीफ्यूज या कार पुर्जे, दोनों बना सकते थे, बम के लिए या तेल रिफाइनरी के लिए सेंसर। खरीदना कानूनी था। निर्यात करना आसान था। जब तक कोई ढूंढ न रहा हो, जाँच असंभव। बार्लो हमेशा ढूंढते रहते थे।
उन्होंने पेंसिल्वेनिया से मारेजिंग स्टील [Maraging steel - अत्यंत उच्च शक्ति वाला विशेष इस्पात जो सेंट्रीफ्यूज रोटर के लिए उपयोग होता है] की एक खेप का पीछा किया। यह विशेष धातु लगभग केवल सेंट्रीफ्यूज रोटर के लिए उपयोग होती है। वही सेंट्रीफ्यूज जो यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड [Uranium hexafluoride - UF6] गैस को अलग करने के लिए सुपरसोनिक गति से घूमती है। वही जो अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम बनाने के लिए चाहिए। खरीदार था अरशद परवेज़ नाम का एक पाकिस्तानी व्यवसायी। उसके पीछे था इनाम उल-हक, पाकिस्तानी सेना का एक सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर। बार्लो के पास उल-हक की सालों पुरानी फाइलें थीं। एक अहम सरकारी एजेंट। कोई अकेला दलाल नहीं।
पाकिस्तान सरकार अमेरिकी कंपनियों से, अमेरिकी धरती पर बम के लिए खरीदारी कर रही थी। बार्लो ने यूएस कस्टम्स को बुलाया। पेंसिल्वेनिया के एक होटल में जाल बिछाया गया। कमरे में रिकॉर्डिंग की व्यवस्था की। परवेज़ आया। वहीं गिरफ्तार हुआ। उल-हक कभी नहीं आया। किसी ने उसे पहले ही सूचित कर दिया था।
विफल जाँच
बार्लो ने संदेश लाइन दर लाइन पढ़े। वहाँ था — व्हाइट हाउस के नजदीक दो उच्चपदस्थ अमेरिकी अधिकारियों ने इस्लामाबाद को ऑपरेशन की पूर्व सूचना दी थी। वही अधिकारी जिनका काम परमाणु प्रसार रोकना था, न कि उसे आसान बनाना। बार्लो ने अपने वरिष्ठों को बताया। सीआईए हरकत में आई। यह आपराधिक मामले थे। न्याय में बाधा। विदेशी परमाणु कार्यक्रम को सहयोग।
विदेश विभाग के वकील बीच में आ गए। जाँच में गोपनीय जानकारी उजागर होगी। राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ेगी। जाँच दफन हो गई। उसी हफ्ते रीगन ने कांग्रेस में फिर वही बयान दिया — "पाकिस्तान के पास कोई परमाणु विस्फोटक उपकरण नहीं है।"
बार्लो अपनी मेज पर बैठे खान अनुसंधान प्रयोगशालाओं की तस्वीरें देखते रहे। सेंट्रीफ्यूज अभी घूम रही थीं। संवर्धन हो रहा था। सब जानते थे। और सब अनजान बने हुए थे।
बार्लो को पता चला कि विदेश विभाग केवल जानकारी छिपा नहीं रहा था, वह सक्रिय रूप से मदद कर रहा था। पाकिस्तानी दूतावास को उच्च-तकनीकी उपकरण निर्यात के लिए अनुमोदन दिए जा रहे थे। वही उपकरण जिन्हें वाणिज्य विभाग पहले ही नकार चुका था। परमाणु हथियारों के लिए अहम उपकरण।
दर्जनों अनुमोदन। सब दस्तावेजों में दर्ज। सब ऐसी जगह दाखिल जहाँ कोई देखता नहीं। बार्लो ने यह अपने बॉस रिचर्ड केर्र को दिखाया, जो उप निदेशक थे और जो अभी भी मानते थे कि व्यवस्था काम कर सकती है। केर्र ने बैठक बुलाई। विदेश विभाग के अधिकारियों को लैंगली बुलाया। सबूत सामने रखे।
केर्र ने कहा, "हम समझते हैं कि पाकिस्तान को अपने पाले में रखना जरूरी है। लेकिन यह रुकना चाहिए।" विदेश विभाग के अधिकारियों ने सिर हिलाया। वे समझ गए। देखेंगे। वादा किया। बार्लो ने उन पर भरोसा किया।
पैटर्न
1986 तक बार्लो ने अमेरिकी सरकार में पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम पर सबसे विस्तृत फाइल तैयार कर ली थी। सुविधाओं के नक्शे। आपूर्तिकर्ताओं की सूचियाँ। एजेंटों के नाम। बैंक रूटिंग नंबर। शिपिंग के समय-सारिणी। वे पाकिस्तान के बम के बारे में अधिकांश पाकिस्तानी अधिकारियों से ज्यादा जानते थे।
सीआईए ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। उन्हें जटिल मामले, असंभव पहेलियाँ दी जाती थीं। वे हमेशा जवाब ढूंढ लेते। अथक और जुनूनी। सहयोगी उन्हें प्रतिभाशाली कहते। सिंडी उन्हें दृढ़ प्रतिज्ञ कहती। दोनों सही थे। लेकिन एक परेशान करने वाली बात दिखने लगी थी। उनकी रिपोर्टें गायब होती जा रही थीं। शाब्दिक अर्थ में नहीं। वे दाखिल होती थीं, संग्रहित होती थीं, ऊपर भेजी जाती थीं। लेकिन कुछ होता नहीं था। न गिरफ्तारी। न कूटनीतिक दबाव। न निर्यात अस्वीकृति। खुफिया जानकारी तभी उपयोगी है जब कोई उस पर कार्रवाई करे। लेकिन कोई नहीं कर रहा था।
इस बीच रीगन कांग्रेस को आश्वस्त करते रहे। शुल्ट्ज़ पाकिस्तान की संयम की तारीफ करते रहे। एफ-16 लड़ाकू विमान [F-16 fighter jets] इस्लामाबाद जाते रहे। 1980 के दशक के मध्य तक 40 विमान भेजे जा चुके थे, इस कड़ी शर्त के साथ कि इनमें से कोई भी परमाणु हथियार ले जाने के लिए संशोधित नहीं किया जाएगा। बार्लो ने तकनीकी विशेषताएँ हासिल कीं जो दिखाती थीं कि सभी 40 विमान ठीक वही काम करने के लिए तैयार किए गए थे।
उन्होंने रिपोर्ट लिखी। दाखिल की। इंतजार किया। कुछ नहीं हुआ।
1987 की कांग्रेस सुनवाई
कांग्रेसमैन स्टीफन सोलार्ज़ थक चुके थे। न्यू जर्सी के डेमोक्रेट को प्रशासन के आश्वासनों पर भरोसा नहीं रहा था। परवेज़ मामले ने सुर्खियाँ बटोरी थीं। एक पाकिस्तानी बम सामग्री खरीदते पकड़ा गया था। सोलार्ज़ ने बंद कमरे में संसदीय सुनवाई की माँग की। टॉप सीक्रेट। कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं। बस तथ्य।
व्हाइट हाउस ने जनरल डेविड आइनसेल को भेजा। एक सेना जनरल जो सीआईए में तैनात था। रीगन ने खुद उसे स्टार वार्स कार्यक्रम [Star Wars program] का प्रमुख चुना था। एक ऐसा इंसान जो राजनीतिक हवा का रुख जानता था। बार्लो को पिछली कुर्सी पर बैठाया गया था ताकि तकनीकी सवाल आने पर आइनसेल की सहायता कर सकें।
सोलार्ज़ ने सीधे पूछा, "क्या परवेज़ और उल-हक पाकिस्तान सरकार के एजेंट थे?"
आइनसेल ने बिना रुके कहा, "यह इतना सीधा नहीं है।"
कांग्रेस से झूठ बोलना आपराधिक है। टालमटोल नहीं। उसी दिन उसी गलियारे में दूसरी सुनवाई में इरान-कॉन्ट्रा मामले [Iran-Contra affair - 1980 के दशक का अमेरिकी राजनीतिक घोटाला जिसमें ईरान को हथियार बेचकर प्राप्त धन गुप्त रूप से निकारागुआ के विद्रोहियों को दिया गया था] में कर्नल ऑलिवर नॉर्थ से यही बात सिद्ध की जा रही थी।
सोलार्ज़ बार्लो की ओर मुड़े, "क्या आप जनरल आइनसेल के आकलन से सहमत हैं?" कमरे में सन्नाटा छा गया। बार्लो हाँ कह सकते थे। अपने वरिष्ठ का समर्थन कर सकते थे। खेल में शामिल हो सकते थे। लेकिन उन्होंने सच बोला।
"यह स्पष्ट है कि परवेज़ पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का एजेंट था।"
कमरे में हंगामा मच गया। चिल्लाहट। आइनसेल का चेहरा लाल हो गया लेकिन वे बोले, "बार्लो को नहीं पता वह क्या कह रहा है!"
सोलार्ज़ आगे झुके, "क्या पाकिस्तान सरकार से जुड़े अन्य मामले भी हैं?"
आइनसेल इस बार तैयार था, "नहीं।"
बार्लो का मुँह सूख गया। उन्हें अपनी मेज पर रखी फाइलें याद आईं। दर्जनों मामले। सालों का सबूत। "हाँ," वे बोले। "दर्जनों अन्य मामले हैं।"
बैठक बिखर गई। सांसद चिल्लाने लगे। आइनसेल चीखे। कर्मचारी भाग-दौड़ करने लगे।
बार्लो को एक सीआईए कार में बिठाया गया। गाड़ी लैंगली की ओर दौड़ी, पहुँचने से पहले ही फोन बजने लगे। व्हाइट हाउस घबरा गया था। पाकिस्तान अफगान अभियान की धुरी था। अरबों की सैन्य सहायता इस बात पर निर्भर थी कि पाकिस्तान परमाणु-मुक्त रहे। सोवियत विरोधी पूरा प्रॉक्सी युद्ध इसी सहायता के भरोसे था। और किसी ने कांग्रेस में सच बोल दिया था। उस किसी को ठीक करना था।
चुप्पी
अगले दिन बार्लो काम पर आए तो किसी जाँच की उम्मीद थी। सवाल होंगे। किसने क्या अनुमति दी। कोई हिसाब-किताब। इसकी बजाय सन्नाटा था। फोन बंद हो गया। सहयोगी गलियारों में मिलने से कतराने लगे। उनकी रिपोर्टें फाइलों में जाती थीं और बाहर नहीं निकलती थीं। उन्होंने अपनी पूरी श्रृंखला की मंजूरी के साथ गवाही दी थी। उन्होंने एक गोपनीय सुनवाई में सच बोला था। उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। लेकिन उन्होंने व्हाइट हाउस को शर्मिंदा किया था। उन्होंने अफगानिस्तान अभियान को खतरे में डाला था।
उन्होंने खुफिया काम का अलिखित नियम तोड़ा था। नीति मत बनाओ। बस उसका समर्थन करो।
बार्लो घर आए। वे और सिंडी विवाह परामर्श ले रहे थे, रिश्ते को मजबूत बनाने की कोशिश कर रहे थे। अब दबाव कई गुना बढ़ गया था।
सिंडी ने पूछा, "क्या हुआ?"
"मैंने सच बोला," उन्होंने कहा।
सिंडी ने देर तक उन्हें देखा। वे भी सीआईए में काम करती थीं। जानती थीं यह कहाँ जाएगा। "तो हम मुश्किल में हैं," उन्होंने कहा।
उसी साल रीगन ने कांग्रेस में फिर बयान दिया, "भारतीय उपमहाद्वीप या कहीं और परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने की राष्ट्रपति की प्रतिबद्धता में कोई कमी नहीं है।" बार्लो ने यह अखबार में पढ़ा। काहुटा में घूमती सेंट्रीफ्यूज के बारे में सोचा। संवर्धन हो रहा था। जो बम पहले से मौजूद था। उन्हें एक बात समझ में आई जो शुरू से स्पष्ट होनी चाहिए थी थी। व्यवस्था टूटी नहीं थी। यह ठीक वैसे ही काम कर रही थी जैसी बनाई गई थी। बार्लो ही इस व्यवस्था के अनुकूल नहीं थे।
पतन (1989–1993)
सुनवाई के बाद बार्लो सीआईए में नहीं रह सकते थे। जनरल आइनसेल ने यह सुनिश्चित किया। 1987 के अंत में उन्होंने इस्तीफा दे दिया। कुछ महीनों के लिए उन्हें लगा कि पाकिस्तान, खुफिया काम और इस पूरी उलझन से उनका रिश्ता खत्म हो गया। लेकिन जनवरी 1989 में पेंटागन ने बुलाया। रक्षा सचिव [Secretary of Defense] के कार्यालय में जगह थी। सामूहिक विनाश के हथियारों [Weapons of Mass Destruction - WMD] के लिए पहले खुफिया विश्लेषक।
सिंडी को संदेह था, "क्या सच में लगता है वहाँ अलग होगा?"
"होना ही है," उन्होंने कहा। "यह पेंटागन है। उन्हें सटीक खुफिया जानकारी चाहिए।" वे गलत थे। उन्हें एक ऐसा टीम-प्लेयर चाहिए था जो दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करे।
हफ्तों में ही बार्लो के पास नए सबूतों का ढेर था। पाकिस्तानी सेना अमेरिकी एफ-16 विमानों [F-16 jets] का उपयोग परमाणु हथियारों की डिलीवरी प्रणाली परखने के लिए कर रही थी। वही विमान जो अमेरिका ने बेचे थे। अनुबंध में स्पष्ट था कि किसी विमान को परमाणु बम ले जाने के लिए संशोधित नहीं किया जाएगा। लेकिन शर्तों का कोई मतलब नहीं था। बार्लो ने यह दर्ज किया। उनके सबूत पक्के थे।
पेंटागन सुनना नहीं चाहता था। वे पाकिस्तान को 1.4 अरब डॉलर के सौदे में 60 और एफ-16 बेचने की तैयारी में थे। अधिकारी उन पर दबाव डालते रहे कि निष्कर्ष बदलें, भाषा नरम करें। जहाँ कोई अनिश्चितता नहीं थी वहाँ जोड़ें। उन्होंने मना किया।
उनकी मेज से फाइलें गायब होने लगीं। एक दिन एक सेक्रेटरी ने उन्हें अलग बुलाया, "कोई आपके कागज रोक रहा है।" जुलाई 1989 में उन्हें बुलाया गया। पेंटागन के एक शीर्ष हथियार बिक्री अधिकारी सामने बैठे थे। "आप एफ-16 सौदे को बर्बाद कर रहे हो।"
"मैं वही रिपोर्ट कर रहा हूँ जो खुफिया जानकारी दिखाती है," बार्लो ने जवाब दिया।
"टीम-प्लेयर बनो," कहा गया।
आठ दिन बाद कांग्रेस ने रक्षा विभाग से सीधे पूछा — क्या पाकिस्तान एफ-16 को परमाणु बम गिराने के लिए संशोधित कर सकता है? जवाब आया, आधिकारिक और स्पष्ट — "पाकिस्तान के पास जो एफ-16 हैं या खरीदने वाले हैं, उनमें से कोई भी परमाणु डिलीवरी के लिए तैयार नहीं है।"
बार्लो ने यह बयान पढ़ा। उन्होंने उनकी खुफिया रिपोर्टों का उपयोग करके कांग्रेस से झूठ बोला था। फिर।
4 अगस्त 1989
शुक्रवार को उन्हें बर्खास्त किया गया। कहा गया, "हमें विश्वसनीय सूचना मिली है कि आप सुरक्षा के लिए खतरा हैं।"
"कौन सी सूचना?" उन्होंने पूछा।
"वह गोपनीय है।"
"मैं सुरक्षा के लिए कैसे खतरा हूँ?" उन्होंने फिर पूछा।
"हम नहीं बता सकते। सूचना गोपनीय है।"
"यह सूचना किसने दी?" उन्होंने बेकार पूछा।
"वरिष्ठ रक्षा विभाग के अधिकारी। उनकी पहचान भी गोपनीय है।"
दफ्तर में अफवाह फैल चुकी थी। बार्लो सोवियत जासूस है। वे चुपचाप गाड़ी चलाते हुए घर गए। वे और सिंडी विवाह परामर्श ले रहे थे, धीरे-धीरे वापस पटरी पर आ रहे थे।
"क्या कह रहे हैं?" सिंडी ने पूछा।
"कि मैं जासूस हूँ," बार्लो ने रूखेपन से कहा।
बदनामी
बार्लो को एक वकील मिला जो मुफ्त में काम करने को तैयार था। तब असली दस्तावेज़ सामने आए। वे करों में धोखाधड़ी करते थे, शराबी थे, और विश्वासघाती पति। हर सरकारी नौकरी से निकाले गए थे। विवाह परामर्श दरअसल मनोचिकित्सा थी। वे मानसिक रूप से अस्थिर थे। इसमें से कुछ भी सच नहीं था। सब कुछ सरकारी फाइलों में दर्ज था।
जाँच ने विवाह परामर्शदाता से मिलने की माँग की। उससे बार्लो की मानसिक स्थिति, स्थिरता और रहस्यों के बारे में पूछताछ करना चाहते थे।
बार्लो ने बाद में याद किया, "मुझे सिंडी को बताना था कि उसके निजी डर ओएसडी की जाँच में खंगाले जाएँगे।" वह उसी हफ्ते चली गईं। जल्द ही तलाक के कागज आ गए। पेशेवर जिंदगी तबाह। व्यक्तिगत जिंदगी खत्म। नाम बदनाम।
इन सबके पीछे जाने-पहचाने नाम थे। डिक चेनी के चीफ ऑफ स्टाफ [Chief of Staff] स्कूटर लिब्बी [Scooter Libby]। पॉल वोल्फोविट्ज़ के दो अधिकारी। वही लोग जिन्हें पाकिस्तान को साफ-सुथरा दिखाने की जरूरत थी ताकि पैसे का प्रवाह जारी रहे। लेकिन बार्लो के वकीलों ने हार नहीं मानी। जाँच की माँग की। तीन एजेंसियों के महानिरीक्षकों को शामिल किया। रक्षा, सीआईए, विदेश विभाग। चार साल लगे। सितंबर 1993 में शर्मन फंक ने अपने निष्कर्ष सुनाए। प्रमुख महानिरीक्षक। अंतिम निर्णय।
"विश्वासघात का आरोप एक ऐसी गलती है जिसे किसी भी सबूत का एक कण भी समर्थन नहीं करता। बार्लो की बर्खास्तगी का सच, सीधे शब्दों में, यह है कि यह अनुचित और अनावश्यक थी।"
उन्होंने पूरे मामले को "काफ्का जैसा" बताया। कहा कि बार्लो को "उन नीतियों से सहमत होने से इनकार करने की कीमत चुकानी पड़ी जो वे जानते थे गलत हैं।"
अंतिम रिपोर्ट पेंटागन को प्रकाशन के लिए भेजी गई। जब बाहर आई, पूरी तरह फिर से लिखी जा चुकी थी। पेंटागन को बरी कर दिया गया था। पाकिस्तान परमाणु-मुक्त था। एफ-16 बम नहीं ले जा सकते। जिसकी प्रतिष्ठा को नुकसान हुआ वह केवल बार्लो थे। फंक हैरान थे। लेकिन कुछ नहीं कर सकते थे। पेंटागन के पास अंतिम दस्तावेज़ पर नियंत्रण था। बाद में चेनी को दी गई बार्लो की मूल ब्रीफिंग भी मिली। वह भी फिर से लिखी जा चुकी थी। पाकिस्तान को सभी आरोपों से मुक्त। निष्कर्ष था कि अमेरिकी सहायता जारी रखने से पाकिस्तान को सामूहिक विनाश हथियार अपनाने से रोका जाएगा। कागजी निशान मिटा दिए गए थे।
पैटर्न जारी रहा
1993 तक बार्लो को बर्बाद करने वाले अधिकारी सत्ता से बाहर थे। क्लिंटन व्हाइट हाउस में थे। रिपब्लिकन विपक्ष में। लेकिन वे गायब नहीं हुए। रम्सफेल्ड। वोल्फोविट्ज़। आर्मिटेज। पर्ल। बोल्टन। सब फिर से इकट्ठे हुए। पाकिस्तान को परमाणु हथियारों से रोकने की बजाय इराक युद्ध के लिए लॉबिंग शुरू की।
जुलाई 1998 में रम्सफेल्ड [Donald Rumsfeld] और वोल्फोविट्ज़ ने बैलिस्टिक मिसाइल खतरों [Ballistic missile threats] पर एक आयोग का नेतृत्व किया। उन्होंने अमेरिका के मुख्य खतरे गिनाए — ईरान, इराक और उत्तर कोरिया। पाकिस्तान सूची में नहीं था। दो महीने पहले पाकिस्तान बलूचिस्तान के रेगिस्तान में पाँच परमाणु विस्फोट कर चुका था। 15 साल से बार्लो जो कह रहे थे, वह सिद्ध हो गया था। किसी ने माफी नहीं माँगी।
क्लिंटन प्रशासन
जब क्लिंटन के लोगों ने बार्लो का मामला खंगाला तो हैरान रह गए। केवल बार्लो के साथ क्या हुआ उससे नहीं, बल्कि इसके पाकिस्तान नीति के लिए मतलब से। अमेरिका ने इस्लामाबाद को परमाणु बम दे दिया था। अब उसे रोकने का कोई जोर नहीं था। क्लिंटन ने बार्लो के लिए 10 लाख डॉलर मुआवजे पर दस्तखत किए, मान्यता और माफी के साथ। बार्लो को पैसे कभी नहीं मिले। सौदे को कांग्रेस की मंजूरी चाहिए थी। प्रक्रियात्मक अड़चनों में फँस गई। संघीय दावा न्यायालय को समीक्षा के लिए भेजी गई। वहीं अटकी रही जब क्लिंटन ने कार्यालय छोड़ा।
बुश प्रशासन
2001 में जॉर्ज डब्ल्यू. बुश सत्ता में आए। पुरानी टीम वापस लाए। चेनी उपराष्ट्रपति। रम्सफेल्ड रक्षा मंत्री। वोल्फोविट्ज़ उप रक्षा सचिव। उन्होंने तुरंत बार्लो का मामला दबा दिया। सीआईए निदेशक जॉर्ज टेनेट ने राज्य रहस्य विशेषाधिकार [State secrets privilege] लागू किया। एनएसए निदेशक माइकल हेडन ने भी। बार्लो के मामले से जुड़ी हर बात गोपनीय। राष्ट्रीय सुरक्षा। सबूत के बिना उनका कानूनी दावा बिखर गया। विकल्प खत्म। पैसा खत्म। और बुरी तरह, उम्मीद भी खत्म।
मॉन्टाना
बार्लो ने अपनी आखिरी बचत से एक पुराना चाँदी-रंगा एवियन ट्रेलर खरीदा। जो बचा था उसे समेटा। बोज़मेन, मॉन्टाना के बेयर कैनियन कैंपग्राउंड में चले गए। वहीं रहे, अपने कुत्तों के साथ।
अफगानिस्तान में जो शिविर कभी अमेरिकी-समर्थित मुजाहिदीन को प्रशिक्षित करते थे, वे जिहादियों के प्रशिक्षण केंद्र बन गए थे। कई को पाकिस्तानी सेना का वित्त-पोषण मिलता था। अल-कायदा का पाकिस्तान के साथ स्वाभाविक जुड़ाव था। पाकिस्तानी सेना के कुछ तत्व सहानुभूतिशील थे। विश्लेषकों ने बुश प्रशासन को आगाह किया। पाकिस्तान सबसे बड़ा खतरा है। कोई सुनना नहीं चाहता था। चेनी, रम्सफेल्ड [Donald Rumsfeld] और वोल्फोविट्ज़ का नया निशाना था। इराक।
उन्होंने पाकिस्तान को आतंक के खिलाफ युद्ध में सहयोगी बनाया। रीगन के 1980 के दशक वाला वही खेल। दुश्मन अलग। नतीजा वही। विदेश विभाग का अप्रसार ब्यूरो परेशानी खड़ी करने लगा। पाकिस्तान के बारे में सवाल पूछने लगा। बुश टीम ने उसे तोड़ दिया।
2006
रिपब्लिकन ने कांग्रेस के दोनों सदन खो दिए। इराक युद्ध तबाही थी। पाकिस्तान के वाशिंगटन में दोस्त कम हो गए थे। बार्लो के वकीलों को मौका दिखा। कैपिटल हिल पर मुआवजे का दावा दायर किया। इस बार शायद सुना जाए।
बार्लो ने अपने ट्रेलर से कहा, "लेकिन यह अंतिम सुनवाई उन्हें दोषी नहीं ठहरा सकती जिन्होंने मेरा पीछा किया। या खुफिया जानकारी को तोड़ा-मरोड़ा। और अब बहुत देर हो गई है उस परमाणु तकनीक के प्रवाह को रोकने के लिए जो पाकिस्तान ने दुनिया में फैलाई।"
"अगर उन नेटवर्कों को तोड़ दिया होता," बार्लो ने कहा, "तो ईरान का कोई परमाणु कार्यक्रम नहीं होता। उत्तर कोरिया के पास यूरेनियम बम नहीं होता। और पाकिस्तान के पास सौ से ज्यादा परमाणु हथियार नहीं होते जिन्हें वे हमसे छिपाने के लिए वैनों में घुमाते हैं।" उन्होंने एक और सिगरेट बनाई। कुत्तों को बाहर जाने दिया। मॉन्टाना का आसमान देखते रहे।
मुआवजा
सुनवाई हुई। आखिरकार। बीस साल बाद कांग्रेस ने उन्हें लाखों डॉलर दिए। माना कि उनके साथ क्या हुआ और अन्याय स्वीकार किया। लेकिन पैसों से कुछ नहीं बदला। वे अभी भी मॉन्टाना में थे। अभी भी ट्रेलर में। अभी भी उस दुनिया से छिपते हुए जिसने उन्हें मिटाने की कोशिश की थी। कुछ घाव मुआवजे से नहीं भरते। कुछ विश्वासघात बहुत गहरे होते हैं।
अग्रिम प्रतिरोध
बार्लो सब बातों में सही निकले। पाकिस्तान को 1980 के दशक में ही बम मिल गया। ए.क्यू. खान ने दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु काला बाज़ार खड़ा किया। ईरान, उत्तर कोरिया, लीबिया को रहस्य बेचे। लेकिन कुछ ऐसा हो रहा था जो बार्लो मॉन्टाना के ट्रेलर से नहीं देख सकते थे। कुछ जो उन्हें भी चौंका देता।
2000 के दशक तक अमेरिका ने हकीकत मान ली थी। पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं। वापस नहीं लिए जा सकते।
9/11 ने पूरा हिसाब बदल दिया। अमेरिका ने पाकिस्तान को प्रस्ताव दिया। हम तुम्हारे परमाणु हथियारों को सुरक्षित करने में मदद करेंगे, सुविधाओं की रक्षा करेंगे, तुम्हारे लोगों को प्रशिक्षित करेंगे। यह उचित लगा। परमाणु सुरक्षा सहयोग। निर्यात नियंत्रण [Export controls]। कार्मिक विश्वसनीयता कार्यक्रम [Personnel Reliability Program]। सामग्री सुरक्षा। परिवहन सुरक्षा। लेकिन यह तो बस बाहरी कहानी थी। अमेरिका कुछ बहुत बड़ा बना रहा था। यह अब रोकना या नियंत्रित करना नहीं था।
इसे अग्रिम प्रतिरोध [Forward deterrence] कहा गया। खुद को खतरे के बीच बसा लो। खतरे के अंदर से रहो। भीतर से निगरानी करो। दो स्थान अहम बने। रावलपिंडी के पास नूर खान वायु सेना अड्डा और पंजाब में किराना पहाड़ियाँ। दोनों 2025 में भड़कने के केंद्र बने।
नूर खान वायु सेना अड्डा
इमतियाज गुल कोई षड्यंत्र-कथावाचक नहीं हैं। वे एक गंभीर पत्रकार हैं। दशकों से सैन्य और सुरक्षा विषयों पर रिपोर्टिंग। क्षेत्रीय भू-राजनीति पर किताबें। पाकिस्तान के रक्षा हलकों में विश्वसनीय और सम्मानित। 2025 की शुरुआत में उन्होंने एक वीडियो पोस्ट किया जो वायरल हो गया।
नूर खान वायु सेना अड्डा अमेरिकी नियंत्रण में है। केवल अफगानिस्तान युद्ध के दौरान नहीं। अभी और आज। इसी पल। उन्होंने अनुमान नहीं लगाया। उन्होंने खास घटनाओं का हवाला दिया। रात को अमेरिकी मालवाहक विमान उतरते हैं। पाकिस्तानी अधिकारियों को बताए बिना उपकरण उतारते हैं। जब पाकिस्तानी वायु सेना के कर्मियों ने सवाल किए, अमेरिकी मरीनों [US Marines] ने पिस्तौल निकाल लिए।
एक घटना खास थी। पाकिस्तानी अधिकारियों ने एक मालवाहक खेप की जाँच करने की कोशिश की। एक अमेरिकी मरीन ने हथियार निकाला। उन्हें पीछे हटने को कहा। सोचिए। एक विदेशी सैनिक मेजबान देश के अधिकारियों पर उनकी ही सैन्य अड्डे पर बंदूक तान रहा है। यह सहयोग नहीं है। यह कब्जा है। गुल ने सीधे कहा। अड्डा अमेरिकी प्रोटोकॉल के तहत चलता है। पाकिस्तानी निगरानी का वहाँ कोई अस्तित्व नहीं।
एक संप्रभु राष्ट्र अपनी ही धरती पर अपने वायु अड्डे तक नहीं पहुँच सकता।
किराना पहाड़ियाँ
अगर नूर खान छल था, तो किराना पहाड़ियाँ विश्वासघात था। किराना पहाड़ियों की भूरी चट्टानें अपनी सबसे ऊँची चोटी पर 1,050 फुट ऊँची हैं। स्थानीय लोग इसे काला पहाड़ कहते हैं। यह रबवाह और सरगोधा के बीच 100 वर्ग मील में फैली है, नमक की श्रेणी से 80 मील दूर। इसे पाकिस्तान का एरिया 51 [Area 51 - अत्यंत गुप्त अमेरिकी सैन्य ठिकाना] भी कहते हैं। दस से अधिक भूमिगत सुरंगें हैं, पत्थर में गहरे बंकर बने हुए। अंधेरे में परमाणु वारहेड रखे हैं। दो दर्जन क्षैतिज सुरंगें, हर एक 100 से 150 फुट लंबी। छियालीस छोटी सुरंगें। पैंतीस भूमिगत सैन्य आश्रय। चट्टान में दबे कमांड सेंटर।
पाकिस्तान ने 1980 के दशक की शुरुआत में वहाँ पहला उपक्रांतिक परमाणु परीक्षण [Subcritical nuclear test - ऐसा परमाणु परीक्षण जिसमें श्रृंखला अभिक्रिया या विस्फोट नहीं होता] किया था। कोडनेम किराना-I। यह स्थल चार दशकों से पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का केंद्र था। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार सुरक्षा सहयोग समझौते के तहत अमेरिकी कर्मियों की वहाँ पहुँच थी। अब वे पाकिस्तान के परमाणु भंडारण की निगरानी कर सकते थे और आवाजाही पर नजर रख सकते थे।
अग्रिम प्रतिरोध काम कर रहा था। अमेरिका पाकिस्तान के परमाणु ढाँचे के भीतर रह रहा था। सब कुछ की सक्रिय जानकारी थी। वास्तविक वीटो शक्ति बन गई थी। लेकिन पाकिस्तान में कोई एरिया 51 के बारे में ज्यादा नहीं जानता था।
7–9 मई 2025
भारत ने ऑपरेशन सिंदूर चलाया। आधिकारिक तौर पर आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों पर हमलों के रूप में वर्णित। लेकिन निशानों ने एक अलग कहानी बताई। भारतीय वायु सेना ने परिशुद्ध निर्देशित मिसाइलों [Precision-guided missiles] का उपयोग किया। उपग्रह चित्रों ने व्यापक क्षति दिखाई। उच्च-मूल्य के लक्ष्य नष्ट हुए।
इस परिमाण के हमलों पर पाकिस्तान आमतौर पर तुरंत जवाबी कार्रवाई करता। इसकी बजाय उसने संघर्षविराम की तत्काल गुहार लगाई। अति-त्वरित बातचीत की माँग। कुछ बहुत गड़बड़ था। एयर मार्शल ए.के. भारती ने भारत के हवाई अभियान का नेतृत्व किया था। एक पत्रकार ने सीधे पूछा।
"क्या किराना पहाड़ियों में परमाणु संपत्तियाँ थीं?"
उनका जवाब सोचा-समझा था। "हम नहीं जानते।"
उन्होंने हमला करने से इनकार नहीं किया। उन्होंने वहाँ क्या था, उसके बारे में अनिश्चितता जताई। लेकिन सब समझ गए इसका मतलब क्या था। अमेरिकी जानते थे। भारतीय हमलों के कुछ घंटों के भीतर अमेरिकी उपराष्ट्रपति नई दिल्ली और इस्लामाबाद के साथ सुरक्षित संपर्क पर थे। वे जानते थे भारत ने क्या निशाना बनाया। वे जानते थे किराना पहाड़ियों में क्या था। वे जानते थे क्योंकि उनके लोग वहाँ थे। अग्रिम प्रतिरोध [Forward deterrence] की रणनीति अभी खुल गई थी। रिसाव या सूचनादाताओं से नहीं, बल्कि भारत की वास्तविक मिसाइल हमलों से।
1989 में बार्लो ने जो चेतावनी दी थी, वह सब सच हो गया था, लेकिन एक ऐसे तरीके से जिसकी किसी ने भविष्यवाणी नहीं की थी। अमेरिका ने पाकिस्तान को बम बनाने से नहीं रोका। बजाय इसके वह पाकिस्तान के कार्यक्रम में इतने गहरे धँस गया कि उसे प्रभावी रूप से नियंत्रित करने लगा। पाकिस्तान को लगा बम उसका अंतिम प्रतिरोधक है, वह तो अमेरिकी निगरानी में था। कोई पाकिस्तानी अधिकारी सार्वजनिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं करेगा। कोई अमेरिकी अधिकारी परिचालन विवरण पर नहीं बोलेगा। लेकिन भारतीय हमलों पर दबी-दबी प्रतिक्रिया ने कहानी खुद बता दी।
24 अक्टूबर 2025
24 अक्टूबर 2025 को सीआईए के पूर्व अधिकारी जॉन किरियाकू ने पाकिस्तान में परमाणु संपत्तियों पर अमेरिकी नियंत्रण की पुष्टि की। उन्होंने किराना पहाड़ियों या नूर खान वायु अड्डे का नाम नहीं लिया। लेकिन उन्होंने बुनियादी अटकल की पुष्टि की कि अमेरिका के पास पाकिस्तान के परमाणु हथियारों पर नियंत्रण था। उन्होंने कहा:
"जब मैं 2002 में पाकिस्तान में तैना__त था, तब मुझे अनौपचारिक रूप से बताया गया था कि पेंटागन पाकिस्तानी परमाणु शस्त्रागार को नियंत्रित करता है। मुशर्रफ ने नियंत्रण संयुक्त राज्य अमेरिका को सौंप दिया था क्योंकि वे ठीक उसी से डरते थे जो आपने अभी वर्णित किया — यह आतंकवादियों के हाथ में पड़ने से।"
किरियाकू को भी सताया गया। सत्य उजागर करने वाले के रूप में उन्हें 23 महीने की जेल हुई, अमेरिकी हिरासत में कैदियों पर यातना उजागर करने के कारण।
भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में दाँव खोल दिया और पीछे हट गया। भारत ने यह भी दिखाया कि यह हमला 25 सालों के उन झूठों का जवाब था जो हर अमेरिकी राष्ट्रपति ने हर भारतीय प्रधानमंत्री के साथ मुस्कुराते हुए बोले।
अग्रिम प्रतिरोध [Forward deterrence] का मतलब था अग्रिम उपस्थिति। अग्रिम उपस्थिति का मतलब था अग्रिम जोखिम। 1987 में बार्लो ने जिस झूठ के ताश के पत्तों के महल को उजागर करने की कोशिश की थी, वह गिर गया। लेकिन कुछ और भी हुआ जिसे किसी ने नोटिस नहीं किया, सिवाय विश्व शक्तियों के। उन्होंने एक नई विश्व व्यवस्था देखी। अगले अध्याय में उसकी चर्चा है।
संदर्भ:
1. Adrian Levy and Catherine Scott-Clark. Deception: Pakistan, the United States, and the Global Nuclear Weapons Conspiracy. New York: Walker & Company, 2007.
2. "Richard Barlow: Nuclear Weapons and Pakistan." Federation of American Scientists (FAS), updated 2007.
3. John Barry. "The Agent Who Warned Congress About Pakistan's Nukes Paid a Steep Price." Newsweek, 12 August 2007.
4. United States Department of State. Office of the Inspector General: Sherman M. Funk.
5. John Kiriakou interview: https://www.youtube.com/watch?v=XIyrvsi1nTw
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