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Published on August 27, 2026

Chapter 5

अमेरिका की नींव और विकास

टैक्स (कराधान) हमेशा जंग को बुलावा देता है।

टैरिफ (सीमा शुल्क) भी एक तरह का टैक्स ही है। हर अर्थशास्त्री यह जानता है। जब डोनाल्ड ट्रम्प ने चीनी सामानों पर टैरिफ (शुल्क) लगाया, तो उसकी कीमत अमेरिकी खरीदारों (उपभोक्ताओं) को चुकानी पड़ी। जब बाइडेन ने उन टैरिफ को जारी रखा, तो अमेरिकी उपभोक्ता लगातार उसे चुकाते रहे। और जब राष्ट्रपति ट्रम्प भारत के सामानों पर 50% टैरिफ लगाने की बात करते हैं, तो अंततः उसका भुगतान अमेरिका के आम लोगों को ही करना पड़ेगा।

लेकिन फिर प्रतिनिधित्व कहाँ है? संसद (कांग्रेस) कहाँ है? वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया कहाँ गई जिसके नाम पर लेक्सिंगटन और कॉनकॉर्ड की ऐतिहासिक लड़ाइयों में लोगों ने अपनी जानें दे दी थीं?

अमेरिकी उपनिवेश के लोगों ने जंग इसलिए लड़ी थी क्योंकि ब्रिटेन के राजा जॉर्ज तृतीय ने संसद के ज़रिए उनकी सहमति के बिना उन पर टैक्स थोप दिए थे। आज अमेरिका के राष्ट्रपति खुद एक कार्यकारी आदेश (Executive Order) पास करके देश के नागरिकों पर उनकी सहमति के बिना टैक्स लगा देते हैं।

वही तानाशाही है, बस झंडा अलग है।

यह पाखंड हैरान करने वाला है। अमेरिकियों ने कभी 'बिना प्रतिनिधित्व के टैक्स लगाने' (No taxation without representation) के खिलाफ क्रांति कर दी थी। लेकिन आज वे बिना किसी प्रतिनिधित्व के भी हर टैक्स को चुपचाप स्वीकार कर लेते हैं, बशर्ते इसे "टैक्स पॉलिसी" के बजाय "ट्रेड पॉलिसी" (व्यापार नीति) का नाम दे दिया जाए।

अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम ब्रिटिश के विरुद्ध एक युद्ध था। इसी तरह अमेरिका का विकास हुआ और उसकी बुनियाद रखी गई।

शुरुआत

संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) की शुरुआत उत्तरी अमेरिका के अटलांटिक किनारे पर फैली 13 ब्रिटिश कालोनियों (उपनिवेशों) से हुई थी। जो काम छोटी और अलग-अलग बस्तियों से शुरू हुआ था, वह आगे चलकर क्रांति, नए प्रयोगों और लगातार बढ़ते दायरे के ज़रिए एक मजबूत देश बन गया। यह कहानी साल 1607 में जेम्सटाउन की स्थापना से लेकर 1867 में अमेरिका के पूरे महाद्वीप पर अधिकार करने के सफर की है।

यह बदलाव न तो आसान था और न ही इसके बारे में पहले से कुछ तय था। शुरुआत में यहाँ बसने वाले लोगों को भुखमरी, जानलेवा बीमारियों और यहाँ के मूल निवासियों के साथ खूनी लड़ाइयों का सामना करना पड़ा। समय के साथ ब्रिटिश सरकार टैक्स और पाबंदियों के ज़रिए और ज़्यादा दमन करने लगी, जिससे आज़ादी की जंग छिड़ गई। इसके बाद, एक आज़ाद देश पर सचमुच राज करने और उसे चलाने की असली चुनौती सामने आई।

अमेरिका की पहली सरकार 'परिसंघ के अनुच्छेदों' (Articles of Confederation) के तहत पूरी तरह नाकाम साबित हुई। आखिरकार, देश के निर्माताओं को 1789 में एक नया संविधान लिखकर बिल्कुल नई शुरुआत करनी पड़ी। तब भी उस नए-नवेले देश को कर्ज़, विदेशी दुश्मनों के खतरों और आपसी फूट से जूझना पड़ा।

पश्चिम की तरफ अपने कदम बढ़ाना अमेरिका का अगला लक्ष्य बना। अमेरिकियों का अटूट विश्वास था कि पूरे महाद्वीप पर अधिकार करना ईश्वर की मर्जी (Manifest Destiny) है। इसी सोच के बहाने उन्होंने मेक्सिको के साथ जंग लड़ी और अमेरिका के मूल निवासियों (नेविट अमेरिकन्स) को बेरहमी से उनकी ज़मीनों से खदेड़कर उनका नामोनिशान मिटा दिया।

साल 1867 आते-आते संयुक्त राज्य अमेरिका अटलांटिक महासागर से लेकर प्रशांत महासागर तक फैल चुका था। रूस से अलास्का को खरीदकर अमेरिका ने पूरे महाद्वीप पर छा जाने के सपने को पूरा कर लिया। लेकिन इस कामयाबी की एक बहुत बड़ी और दर्दनाक इंसानी कीमत चुकानी पड़ी। अमेरिका के मूल निवासियों ने अपनी ज़मीन, अपनी जान और अपनी संस्कृति सब कुछ खो दिया। उधर, गुलाम प्रथा (दासता) को नए इलाकों में फैलाने की बहस ने देश में गृहयुद्ध (Civil War) के बीज बो दिए।

लालची राजा

लगभग 150 सालों के दौरान ब्रिटेन की इन अमेरिकी कालोनियों ने अपनी एक अलग पहचान बना ली थी। साल 1607 में वर्जीनिया का जेम्सटाउन पहली स्थायी ब्रिटिश बस्ती बना। यहाँ बसने वाले लोगों को बेहद मुश्किल हालातों का सामना करना पड़ा। बहुत से लोग बीमारी, भूख और स्थानीय पाउहेटन कबीलों के साथ जंग में मारे गए। मूल अमेरिकियों को तो इससे भी कहीं बड़ी तबाही झेलनी पड़ी।

1600 के दशक में कई और नई कालोनियां बसाई गईं। न्यू इंग्लैंड में वे धार्मिक लोग आकर बसे जो इंग्लैंड के सरकारी चर्च से आज़ाद होना चाहते थे। पेनसिल्वेनिया ने क्वेकर्स और अन्य सताए गए धार्मिक समूहों का खुले दिल से स्वागत किया। कैरोलिना और जॉर्जिया जैसी कालोनियां स्पेन के कब्ज़े वाले फ्लोरिडा के खिलाफ एक ढाल (बफर) की तरह काम आईं।

हर कॉलोनी ने अपना-अपना प्रशासनिक और आर्थिक सिस्टम खड़ा कर लिया था। न्यू इंग्लैंड का मुख्य काम व्यापार, मछली पकड़ना और छोटे पैमाने पर खेती करना था। वहीं चेसापीक खाड़ी के इलाके ने गुलामों से ज़बरदस्ती काम करवाकर तंबाकू की खेती के ज़रिए बेहिसाब दौलत कमाई। दक्षिण कैरोलिना की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चावल और नील की खेती पर टिकी थी।

ब्रिटेन ने शुरुआत में इन अमेरिकी कालोनियों के कामकाज में ज़्यादा टांग नहीं अड़ाई, जिसे "लाभकारी उपेक्षा" (Salutary Neglect) कहा गया। कालोनियों की अपनी विधानसभाओं को अपने फैसले खुद लेने का अधिकार मिल गया था। स्थानीय अमीर और रसूखदार लोग लंदन के बिना किसी दखल के अपने मामले खुद सुलझा लेते थे। इस आज़ादी ने लोगों के मन में हमेशा खुद मुख्तार (स्वायत्त) रहने की उम्मीद जगा दी।

लेकिन साल 1763 में फ्रांस के साथ हुए युद्ध (French and Indian War) ने सब कुछ पलट कर रख दिया। उत्तरी अमेरिका पर अपने कब्ज़े के लिए फ्रांस से लड़ते-लड़ते ब्रिटेन पर भारी कर्ज़ चढ़ गया था। इस जंग में जीत के बाद पूर्वी उत्तरी अमेरिका पर ब्रिटेन का कब्ज़ा तो हो गया, लेकिन उसकी आर्थिक कमर टूट गई। ब्रिटिश संसद ने फैसला किया कि अब इस जंग के खर्च की भरपाई अमेरिकी कालोनियों से टैक्स वसूल कर की जाएगी।

और बस, यहीं से ब्रिटेन के साम्राज्य के अंत की शुरुआत हो गई।

क्रांति की पुकार

ब्रिटेन की नई टैक्स नीतियों ने अमेरिकी कालोनियों में ऐसा भयंकर गुस्सा भड़काया जैसा दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा था। शुगर एक्ट (Sugar Act), स्टाम्प एक्ट (Stamp Act) और टाउनशेंड एक्ट (Townshend Acts) जैसे कानूनों के ज़रिए अमेरिकी व्यापार और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर नए टैक्स लाद दिए गए। लेकिन ये सिर्फ टैक्स नहीं थे, ये कालोनियों की आज़ादी पर किया गया सीधा हमला थे।

वहाँ रहने वाले लोगों ने साफ कह दिया कि जब तक ब्रिटिश संसद में उनका कोई प्रतिनिधि (प्रतिनिधित्व) नहीं होगा, तब तक उन पर कोई टैक्स नहीं लगाया जा सकता। यह सिर्फ कोई किताबी राजनीति नहीं थी, बल्कि यह लोगों का भड़का हुआ गुस्सा था।

"बिना प्रतिनिधित्व के कोई टैक्स नहीं!" (No taxation without representation!)

ये शब्द वह रणघोष बन गए जिसने अलग-थलग पड़ी 13 कालोनियों को दुनिया के सबसे ताकतवर साम्राज्य के खिलाफ एक साथ खड़ा कर दिया। हर दुकानदार, किसान और व्यापारी इस सीधे से सच को समझता था कि ब्रिटेन उन्हें अपनी बात रखने का मौका दिए बिना, दिन-दहाड़े उनकी जेबें काट रहा था।

यह नारा ढाबों, चर्चों और चौराहों पर आग की तरह फैल गया। यह पोस्टरों, अखबारों और गरमा-गरम बहसों में गूंजने लगा। इन चंद आसान शब्दों में एक क्रांतिकारी विचार छिपा था—कि किसी भी सरकार को शासन करने की ताकत वहां के लोगों की सहमति से ही मिलती है।

कालोनियों का यह विरोध केवल याचिकाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामानों के बहिष्कार और हिंसक झड़पों में बदल गया। साल 1770 के बोस्टन नरसंहार (Boston Massacre) और 1773 की बोस्टन टी पार्टी (Boston Tea Party) की घटनाओं ने तनाव को चरम पर पहुँचा दिया। इसके जवाब में ब्रिटेन ने और भी कड़े कानून पास कर दिए, जिन्हें अमेरिकियों ने "असहनीय कानून" (Intolerable Acts) का नाम दिया। इन दमनकारी नियमों ने बंटी हुई कालोनियों को ब्रिटिश राज के खिलाफ एकजुट कर दिया।

इस नारे ने अपना काम कर दिया था। जो 13 कालोंनियां कभी एक-दूसरे से बात तक नहीं करती थीं, वे अब कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी थीं। यह सब हुआ क्योंकि ब्रिटेन यह भूल गया था कि जनता की सहमति के बिना चलाई जाने वाली सरकार तानाशाही होती है।

स्वतंत्रता की राह

साल 1774 तक आते-आते कालोनियों का यह विरोध एक संगठित विद्रोह का रूप ले चुका था। ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ एक साझी रणनीति बनाने के लिए फिलाडेल्फिया में 'पहली महाद्वीपीय कांग्रेस' (First Continental Congress) बुलाई गई। प्रतिनिधियों ने ब्रिटिश सामानों का पूरी तरह बहिष्कार करने और जंग की तैयारी शुरू करने का फैसला किया।

अप्रैल 1775 में आखिरकार लेक्सिंगटन और कॉनकॉर्ड की जगहों पर पहली खूनी लड़ाई छिड़ गई। ब्रिटिश सैनिक कालोनियों के विद्रोही नेताओं को गिरफ्तार करने और उनके हथियारों को ज़ब्त करने के लिए आगे बढ़े थे। लेकिन कालोनियों के जांबाज सैनिकों (मिनट-मैन) ने लेक्सिंगटन के मैदान में उनका डटकर मुकाबला किया। यहाँ चली उस एक गोली ने जिसे "दुनिया भर में सुनी गई गोली" (The shot heard round the world) कहा जाता है, अमेरिकी क्रांति का बिगुल फूंक दिया।

जंग की इस आग को संभालने के लिए मई 1775 में 'दूसरी महाद्वीपीय कांग्रेस' की बैठक हुई। उन्होंने जॉर्ज वाशिंगटन को अपनी सेना का कमांडर-इन-चीफ (मुख्य सेनापति) नियुक्त किया। हालांकि, प्रतिनिधि अभी भी जंग की तैयारी करने के साथ-साथ ब्रिटेन के साथ बातचीत से सुलह का रास्ता ढूंढ रहे थे।

लेकिन अगस्त 1775 में ब्रिटेन के राजा जॉर्ज तृतीय ने अमेरिकी कालोनियों को आधिकारिक रूप से विद्रोही घोषित कर दिया। उन्होंने शांति के आखिरी प्रयास (जैतून की शाखा वाली याचिका - Olive Branch Petition) को फाड़कर फेंक दिया। ब्रिटिश संसद ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए किराए के विदेशी सैनिकों को बुलाने की मंजूरी दे दी। राजा के इन कड़े कदमों ने अमेरिकियों को भरोसा दिला दिया कि अब आज़ादी के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा है।

जून 1776 में थॉमस जेफरसन ने 'आज़ादी के घोषणापत्र' (Declaration of Independence) का मसौदा तैयार किया। इस ऐतिहासिक दस्तावेज़ में ऐलान किया गया कि "सभी इंसानों को ईश्वर ने बराबर बनाया है" और उनके पास "ज़िंदगी जीने, आज़ाद रहने और अपनी खुशी ढूंढने" जैसे जन्मजात अधिकार हैं। इसमें राजा जॉर्ज तृतीय के अत्याचारों की पूरी लिस्ट दी गई थी और कालोनियों को पूरी तरह स्वतंत्र घोषित किया गया था।

4 जुलाई 1776 को महाद्वीपीय कांग्रेस ने इस घोषणापत्र को अपनी मंजूरी दे दी। इस बड़े कदम ने साफ कर दिया कि अब पीछे मुड़ने का कोई रास्ता नहीं था—या तो पूरी आज़ादी मिलनी थी या फिर पूरी तबाही।

यह क्रांतिकारी जंग 1775 से 1783 तक पूरे आठ साल चली। बोस्टन, न्यूयॉर्क और फिलाडेल्फिया के पास लड़ी गईं शुरुआती लड़ाइयों में अमेरिकी फौज को करारी हार का मुंह देखना पड़ा। लेकिन जॉर्ज वाशिंगटन ने ट्रेंटन और प्रिंसटन पर अचानक हमला करके अपनी सेना का खोया हुआ हौसला वापस लौटाया।

साल 1778 में फ्रांस के साथ हुए समझौते ने इस जंग का रुख बदल दिया। फ्रांस ने अमेरिका को हथियार, जहाज़ी बेड़े और पैसों की बड़ी मदद दी। देखते ही देखते स्पेन और हॉलैंड भी ब्रिटेन के खिलाफ इस जंग में कूद पड़े।

साल 1777 में सारातोगा की लड़ाई में अमेरिकी जीत ने फ्रांस को खुलकर मैदान में आने का भरोसा दिलाया था। इस लड़ाई ने साबित कर दिया कि अमेरिका के आम लोग भी यूरोप की पेशेवर सेना को धूल चटा सकते हैं। ब्रिटिश जनरल बर्गॉयने ने अपनी पूरी सेना के साथ अमेरिकी और फ्रांसीसी सैनिकों के सामने घुटने टेक दिए।

जंग का आखिरी दौर दक्षिणी राज्यों में लड़ा गया जो बेहद निर्णायक साबित हुआ। ब्रिटिश सेना ने कुछ बड़े शहरों पर कब्ज़ा तो कर लिया, लेकिन वे ग्रामीण इलाकों पर अपना नियंत्रण नहीं रख पाईं। फ्रांसिस मैरियन जैसे छापामार योद्धाओं ने ब्रिटिश सेना की रसद और सप्लाई लाइन को काट कर रख दिया। आखिरकार, 1781 में यॉर्कटाउन में ब्रिटिश जनरल कॉर्नवालिस के आत्मसमर्पण के साथ इस बड़ी जंग का अंत हो गया।

साल 1783 की 'पेरिस की संधि' (Treaty of Paris) के साथ आधिकारिक रूप से यह जंग खत्म हो गई। ब्रिटेन ने अमेरिका को एक आज़ाद देश के रूप में मान्यता दे दी और अटलांटिक महासागर से लेकर मिसिसिपी नदी तक उसकी सीमाएं तय कर दी गईं। यह पूर्व उपनिवेश अब दुनिया के नक्शे पर एक संप्रभु राष्ट्र बन चुका था।

सरकार चलाने का डर

अमेरिकी इतिहास का सबसे मज़ेदार हिस्सा यह है कि यहाँ के संस्थापक एक नया राजा बनाने से इतने डरे हुए थे कि उन्होंने बिना किसी राष्ट्रपति के ही सरकार बना डाली!

आज़ादी मिलते ही देश के सामने सरकार चलाने का संकट खड़ा हो गया। कालोनियों को एक केंद्रीय सरकार की ज़रूरत तो थी, लेकिन वे ब्रिटेन जैसी तानाशाही को दोबारा पैदा नहीं करना चाहती थीं। एकीकृत शासन के लिए उनका पहला प्रयास था—'परिसंघ के अनुच्छेद' (Articles of Confederation)। महाद्वीपीय कांग्रेस ने इन्हें 1777 में तैयार किया था, लेकिन राज्यों की आपसी खींचतान और केंद्र को ज़्यादा ताकत न देने के डर की वजह से इसे मंज़ूर करने में 1781 तक का समय लग गया।

इन अनुच्छेदों ने एक शक्तिशाली राष्ट्रीय सरकार बनाने के बजाय केवल राज्यों का एक "मित्रता संघ" बनाया। हर राज्य ने अपनी स्वाधीनता और संप्रभुता अपने पास ही रखी। केंद्रीय सरकार का काम सिर्फ साझा हितों और बाहरी दुश्मनों से रक्षा की देखरेख करना था।

लेकिन यहाँ एक ऐसी बात है जिसे अक्सर लोग भूल जाते हैं—इस सरकार में कोई राष्ट्रपति था ही नहीं! बिल्कुल नहीं!

इस सिस्टम के तहत संसद (कांग्रेस) के पास नाममात्र की ताकत थी। वह जंग का ऐलान कर सकती थी, शांति समझौते कर सकती थी और विदेशों से बातचीत कर सकती थी। वह कर्ज़ ले सकती थी और डाक सेवा शुरू कर सकती थी। लेकिन उसके पास टैक्स लगाने, व्यापार को नियंत्रित करने या अपने कानूनों को ज़बरदस्ती लागू करने का कोई अधिकार नहीं था।

संसद हर साल अपने लिए एक अध्यक्ष चुनती थी। लेकिन वह आज के दौर जैसा राष्ट्रपति नहीं था। वह व्यक्ति सिर्फ बैठक का संचालन करने वाला एक सभापति था—एक स्पीकर। उसके पास कोई प्रशासनिक शक्ति (Executive Power) नहीं थी। न तो वह सेना को आदेश दे सकता था और न ही कोई कानून लागू करवा सकता था।

लगभग दस सालों तक अमेरिका बिना किसी मुखिया के चलता रहा। तानाशाही से बचने के चक्कर में इसके निर्माता देश को संभालने के लिए किसी मुखिया को बनाना ही भूल गए थे! सरकार का यह ढीला-ढाला ढांचा तानाशाहों के उस गहरे डर को दिखाता था जो ब्रिटिश राज की वजह से उनके मन में बैठ गया था।

इन नियमों में किसी भी बदलाव के लिए सभी राज्यों की सहमति ज़रूरी थी। और किसी भी बड़े फैसले के लिए 13 में से कम से कम 9 राज्यों की मंज़ूरी चाहिए थी। इस वजह से प्रभावी ढंग से देश चलाना नामुमकिन हो गया था। न तो कोई अलग से प्रशासनिक टीम थी और न ही राज्यों के आपसी झगड़े सुलझाने के लिए कोई कोर्ट (न्यायपालिका) था। बस एक संसद थी और उसका हर साल बदलने वाला सभापति, जिसे वे "राष्ट्रपति" कहते थे।

राज्यों की विधानसभाएं हर साल अपने प्रतिनिधियों को चुनकर संसद में भेजती थीं। पूरे देश के स्तर पर जनता का कोई सीधा चुनाव नहीं होता था।

पैसों की किल्लत ने शुरू से ही इस सरकार की नाक में दम कर रखा था। संसद राज्यों से पैसा मांग तो सकती थी, लेकिन उन्हें देने के लिए मजबूर नहीं कर सकती थी। कई राज्यों ने इन मांगों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया। नतीजा यह हुआ कि राष्ट्रीय सरकार पर कर्ज़ का पहाड़ टूट पड़ा और उसे चुकाने का कोई रास्ता नहीं बचा था।

विदेशी ताकतें भी अमेरिका की इस कमज़ोरी का मज़ाक उड़ाने लगीं। ब्रिटेन ने वादे के मुताबिक अपने किलों को खाली करने से मना कर दिया, और स्पेन ने मिसिसिपी नदी में अमेरिकी जहाजों के आने-जाने पर पाबंदी लगा दी। इन अपमानजनक थप्पड़ों ने सरकार की कमजोरी की कलई खोलकर रख दी।

अंत में, मैसाचुसेट्स के 'शेज़ विद्रोह' (Shays' Rebellion) ने इस ढीली-ढाली सरकार की पोल पूरी तरह खोल दी। भारी कर्ज़ में डूबे किसानों ने टैक्स के खिलाफ बगावत कर दी और केंद्रीय सरकार इस विद्रोह को दबाने के लिए सेना तक नहीं भेज सकी। यह पहला प्रयोग पूरी तरह फेल हो चुका था। अमेरिका को यह सबक मिल गया कि बिना किसी को असली जिम्मेदारी सौंपे देश नहीं चलाया जा सकता।

आखिरकार एक राष्ट्रपति

इस सरकार की नाकामियों ने नेताओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि एक मजबूत केंद्रीय सरकार का होना बेहद ज़रूरी है। अलेक्जेंडर हैमिल्टन और जेम्स मैडिसन ने संविधान में सुधार करने के लिए फिलाडेल्फिया में एक बैठक बुलाई। बैठक में शामिल नेताओं ने जल्द ही तय किया कि सुधार करने के बजाय, क्यों न पूरी तरह से एक नया संविधान ही लिख दिया जाए।

यह ऐतिहासिक बैठक (Constitutional Convention) मई से सितंबर 1787 तक पूरी तरह गुप्त रूप से चली। 12 राज्यों के 55 प्रतिनिधियों ने इसमें हिस्सा लिया। रोड आइलैंड ने इस बैठक का पूरी तरह से बहिष्कार किया था। इस गुप्त बैठक की वजह से प्रतिनिधि बाहर के दबावों और रसूखदार लोगों के प्रभाव से बच सके, और देश के लिए सबसे बेहतरीन ढांचा तैयार करने पर ध्यान लगा पाए।

इस दौरान कई मुश्किल मुद्दों पर समझौते हुए। 'कनेक्टिकट समझौते' (Great Compromise) के ज़रिए बड़ी और छोटी आबादी वाले राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व को लेकर संतुलन बनाया गया। 'तीन-पाँचवें हिस्से के समझौते' (Three-Fifths Compromise) में तय हुआ कि चुनाव के प्रतिनिधित्व के लिए हर 5 गुलामों में से 3 को राज्य की आबादी में गिना जाएगा। वहीं 'इलेक्टोरल कॉलेज' (Electors) के ज़रिए राष्ट्रपति के चुनाव का रास्ता निकाला गया।

नए संविधान ने ताकतों का बंटवारा (Separation of Powers) किया और नियंत्रण व संतुलन (Checks and Balances) का एक मजबूत सिस्टम बनाया। संसद (कांग्रेस) को टैक्स लगाने, राज्यों के बीच व्यापार को कंट्रोल करने और कानून बनाने का अधिकार मिला। राष्ट्रपति को सेना का मुखिया बनाया गया और नीतियां लागू करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। साथ ही, संघीय अदालतों (Federal Courts) को कानूनों की व्याख्या करने का अधिकार मिला।

और सबसे बड़ी बात यह हुई कि अमेरिका को अंततः कार्यकारी शक्तियां संभालने वाला एक असली राष्ट्रपति मिल गया।

इस नए संविधान को लागू करने के लिए 13 में से कम से कम 9 राज्यों की मंज़ूरी ज़रूरी थी। संविधान का समर्थन करने वाले खुद को संघवादी (Federalists) और इसका विरोध करने वाले संघ-विरोधी (Anti-Federalists) कहते थे। असली बहस इसी बात पर थी कि केंद्र सरकार के पास कितनी ताकत होनी चाहिए और राज्यों तथा आम लोगों के अधिकारों की रक्षा कैसे होगी।

संविधान के पक्ष में माहौल बनाने के लिए अलेक्जेंडर हैमिल्टन, जेम्स मैडिसन और जॉन जे ने मिलकर 'फेडरलिस्ट पेपर्स' (Federalist Papers) नाम से कई प्रभावशाली निबंध लिखे। उन्होंने समझाया कि यह नया सिस्टम कैसे तानाशाही और अराजकता, दोनों को रोकने का काम करेगा।

वहीं विरोधियों ने मांग की कि संविधान में आम लोगों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए 'अधिकारों का घोषणापत्र' (Bill of Rights) जोड़ा जाए। उन्हें डर था कि कहीं केंद्र सरकार अपनी ताकतों का गलत इस्तेमाल न करने लगे। आखिरकार, मैडिसन ने संविधान में इन अधिकारों को संशोधन के ज़रिए जोड़ने का वादा किया।

दिसंबर 1787 में डेलावेयर संविधान को मंज़ूर करने वाला पहला राज्य बना। जून 1788 में न्यू हैम्पशायर के नौवें हस्ताक्षर के साथ ही यह नया संविधान लागू हो गया। बाद में वर्जीनिया और न्यूयॉर्क की मंज़ूरी ने इसे पूरी तरह से कानूनी रूप दे दिया।

इस नए गणराज्य के सामने शुरुआत में कई बड़ी मुश्किलें आईं। हैमिल्टन की आर्थिक नीतियों ने देश की साख तो सुधारी, लेकिन इस पर जमकर राजनीति भी हुई। टैक्स के खिलाफ हुए 'व्हिस्की विद्रोह' (Whiskey Rebellion) ने केंद्र सरकार की ताकत की परीक्षा ली, और यूरोप की जंगों ने अमेरिका की निष्पक्ष रहने की नीति को खतरे में डाला।

लेकिन अब अमेरिका के पास एक ऐसी सरकार थी जो सचमुच देश चला सकती थी। इसके पहले राष्ट्रपति एक बेमिसाल शख्सियत थे, उन्होंने ऐसी नीतियां बनाईं जिनका असर अमेरिका पर सदियों तक रहा—और कुछ नीतियां तो आज भी लागू हैं। अगले चैप्टर में हम अमेरिका के इसी पहले राष्ट्रपति के बारे में जानेंगे।

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