सैन्य महाशक्ति
दूसरों से जुड़ने में असमर्थता संकीर्ण दृष्टिकोण पैदा करती है, जो आगे चलकर अकेलेपन की भावना उत्पन्न कर देती है।
क्षमा करें, लेकिन मुझे कहानियाँ बहुत पसंद हैं। शायद मुझे कहानियाँ ही लिखनी चाहिए। यह घटना वास्तविक है, लेकिन आप जानते ही हैं कि मैं विधाओं का कठोर पालन करने वाला नहीं हूँ। इसलिए मुझे एक कंजूस और उसके व्हिस्की से संबंधित छोटी कहानी सुनाने दीजिए।
व्हिस्की वाली कहानी
एक व्यक्ति का एक दूर का रिश्तेदार था। उसके परिवार को उसकी सच्चाई पता थी, लेकिन अधिकांश लोग उसे धनी समझते थे। उसने अपने बेहद अमीर पिता से सब कुछ विरासत में पाया और फिर अपने भाई-बहनों के साथ मिलकर असफल व्यापारों में सब कुछ गँवा दिया। उसने जीवन में कभी एक दिन भी काम नहीं किया। जिस व्यापार को भी उसने छुआ, वह ढह गया। उसने अपनी सास से भी विरासत हथिया ली। अब वह किराए की आय पर जीवन चलाता है। उसका घर उसकी पत्नी के नाम पर था। उसकी माँ ने यह व्यवस्था की थी ताकि वह उसे भी बर्बाद न कर सके।
एक दिन उस रिश्तेदार के घर एक मित्र ठहरने आया। रिश्तेदार के पास एक बहुत बड़ा शीशे का बार रैक था। महँगी स्कॉच की बोतलें ट्रॉफी की तरह सजी हुई थीं। लेकिन न तो गिलास थे, न बैठने की जगह। सिर्फ प्रदर्शन था। जब मित्र ने कुछ पीने को माँगा तो रिश्तेदार ने कहा कि वह कोई बोतल नहीं खोल सकता। ये सब उपहार थीं। उसने अपने मित्र को दूसरे कमरे में ले जाकर सस्ती व्हिस्की पेश की। मित्र ने एक घूँट लिया, धन्यवाद कहा और सोने चला गया।
मित्र को दो दिन ठहरना था। दूसरे दिन उसने बाजार से अपनी खुद की स्कॉच की बोतल लाकर रख ली। वह रिश्तेदार के साथ बैठकर पी रहा था, लेकिन उसे कभी साझा करने की पेशकश नहीं की। उसने उसकी ओर इशारा तक नहीं किया।
उस यात्रा के दौरान रिश्तेदार ने अपने मित्र को अपमानित किया। उसे इसमें आनंद आया। उसे इससे कोई वास्तविक लाभ नहीं हुआ। सिर्फ अपने मित्र को असहज देखकर उसे खुशी हुई। यह शुद्ध क्रूरता थी, जिसे पारिवारिक व्यवहार का रूप दिया गया था। मित्र ने बदला भी लिया—बस उसके घर में बैठकर अपनी बोतल पीकर और उसे साझा न करके। बाद में इस मित्र ने मुझे बताया कि जीवन में वह पहली और आखिरी बार ऐसा व्यवहार कर रहा था।
फिर कोविड-19 के कारण लॉकडाउन आ गया। जिन लोगों के मित्र थे, उन्होंने संसाधनों को आपस में बाँटा और एक-दूसरे की मदद की। इस रिश्तेदार को अपनी सारी महँगी बोतलें अकेले ही पीनी पड़ीं। कोई मित्र उसके पास नहीं आया। जब साथ की जरूरत पड़ी तो उसका कीमती प्रदर्शन बेकार साबित हुआ।
आज का अमेरिका
अमेरिका ने भी एक शीशे का बार रैक बना लिया है। महँगी बोतलें ट्रॉफी की तरह सजी हुई हैं। ग्यारह परमाणु ऊर्जा से चलने वाले विमानवाहक पोत। तेरह हजार सैन्य विमान। अरबों डॉलर के पनडुब्बियाँ। लाखों-करोड़ों डॉलर की मिसाइलें। संग्रह तो प्रभावशाली था। प्रदर्शन बिलकुल सही था। लेकिन न गिलास थे, न बैठने की जगह। सिर्फ प्रदर्शन था।
जब साझेदार मदद माँगने आए तो अमेरिका ने सहयोग की जगह अधीनता पेश की। जब सहयोगियों को प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की जरूरत पड़ी तो अमेरिका ने इनकार कर दिया। जब राष्ट्रों ने वास्तविक साझेदारी माँगी तो अमेरिका ने प्रभुत्व की माँग की। पिछले अध्याय में चर्चित बात याद है न? परिणाम हमेशा एक ही रहा। साझेदार खाली कमरे में चारों ओर देखकर चले गए। अमेरिका के पास महँगी व्हिस्की थी, लेकिन उसे पीने कोई नहीं आया।
खाली बोतलों की सूची
अमेरिका ने अभूतपूर्व कुछ बनाया है। इतिहास में कभी न देखा गया सैन्य तंत्र। जब कोई आपके साथ इसे इस्तेमाल नहीं करना चाहता तो 1.8 ट्रिलियन डॉलर की हथियार सामग्री वास्तव में कैसी दिखती है। ये सिर्फ आँकड़े हैं। चाहें तो छोड़ दें।
वायु शक्ति : शीशे का संग्रह
अमेरिका के पास लगभग 13,000 सैन्य विमान हैं। चार सौ पचास एफ-35 लाइटनिंग II, प्रत्येक नब्बे मिलियन डॉलर का। एक सौ अस्सी एफ-22 रैप्टर, प्रत्येक 150 मिलियन डॉलर का। सिर्फ बमवर्षक विमानों का संग्रह 150 अरब डॉलर का है। बी-2 स्पिरिट बमवर्षक कार्यक्रम का विकास ही 23 अरब डॉलर का पड़ा, फिर प्रत्येक विमान बनाने में 2.2 अरब डॉलर लगे। इक्कीस विमान हैंगरों में खड़े हैं।
तीन हजार छह सौ हेलीकॉप्टर। अपाचे गनशिप प्रत्येक 35 मिलियन डॉलर की। चिनूक परिवहन हेलीकॉप्टर। ईंधन भरने वाले विमान। निगरानी विमान। ड्रोन। प्रशिक्षण विमान।
वायु शक्ति का कुल योग लगभग 595 अरब डॉलर है।
नौसेना का बेड़ा
दुनिया के महासागरों में ग्यारह परमाणु ऊर्जा से चलने वाले विमानवाहक पोत घूम रहे हैं, जो सहयोग करने वाले साझेदारों की तलाश में हैं। प्रत्येक फोर्ड श्रेणी का पोत 13 अरब डॉलर का है। पुराने निमित्ज़ श्रेणी के पोत बनाने में सस्ते पड़े, लेकिन उन्हें आधुनिक बनाने में लगातार भारी खर्च हो रहा है।
70 अर्ले बर्क विध्वंसक [Destroyers - युद्धपोत], प्रत्येक 2.3 अरब डॉलर का। 17 टिकोन्डेरोगा क्रूजर [Cruisers]। 20 उभयचर हमला पोत [Amphibious assault ships]।
पनडुब्बी बल: 14 ओहियो श्रेणी की बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियाँ, जो देश की समुद्री परमाणु रोकथाम [Nuclear deterrence] का काम करती हैं। नई कोलंबिया श्रेणी की पनडुब्बियाँ प्रत्येक 15 अरब डॉलर की होंगी। वर्जीनिया श्रेणी की हमला पनडुब्बियाँ 3.5 अरब डॉलर प्रति नाव। लॉस एंजेलिस श्रेणी की पनडुब्बियाँ उम्रदराज होने के बावजूद अरबों डॉलर की संपत्ति हैं।
सतही बेड़े का कुल योग 480 अरब डॉलर। पनडुब्बी बल का कुल योग 363 अरब डॉलर। कुल मिलाकर एक ट्रिलियन डॉलर के करीब।
स्थल सेना
सेना के पास आज के मूल्य में 4600 एम1 अब्राम्स टैंक हैं, प्रत्येक 15 मिलियन डॉलर का। 3500 ब्रैडली लड़ाकू वाहन। 1000 पैलाडिन स्वचालित होवित्जर [Self-propelled howitzers]। 400 स्ट्राइकर बख्तरबंद वाहन। लगभग दो लाख विभिन्न सामरिक वाहन [Tactical vehicles], हमवी से लेकर नए संयुक्त हल्के सामरिक वाहनों तक। ये मशीनें साझेदारों के साथ लड़ने के लिए बनाई गई थीं। अब वे दुनिया भर के ठिकानों पर खड़ी हैं, उन सहयोगियों का इंतजार कर रही हैं जो अब अनुमति माँगना छोड़ चुके हैं।
स्थल सेना का कुल योग 213 अरब डॉलर है। इसमें नियमित रखरखाव और ईंधन आदि शामिल नहीं हैं।
मिसाइलें और परमाणु सौदा
मिनटमैन III अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें, प्रत्येक सात मिलियन डॉलर की। नई सेंटिनल आईसीबीएम प्रतिस्थापन कार्यक्रम में प्रत्येक मिसाइल 100 मिलियन डॉलर की होगी। ट्राइडेंट पनडुब्बी से छोड़ी जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें 31 मिलियन डॉलर प्रति। टोमहॉक क्रूज मिसाइलें 2.4 मिलियन डॉलर की। हजारों विभिन्न मिसाइलें—पैट्रियट इंटरसेप्टर [Interceptors - मिसाइल रोधी मिसाइलें] से लेकर हिमार्स रॉकेट तक।
परमाणु वारहेड की संख्या लगभग 3700 है, जिनकी उत्पादन और जीवनकाल आधुनिकीकरण को मिलाकर औसतन 20 मिलियन डॉलर प्रति वारहेड का खर्च आता है। मिसाइलें और परमाणु का कुल योग 170 अरब डॉलर है।
जब साझेदार खरीदना बंद कर देते हैं
संग्रह का कोई अर्थ नहीं रह जाता जब कोई उसे खरीदना ही न चाहे। जब कोई सहयोगी अमेरिकी सैन्य नेटवर्क में शामिल होना न चाहे। जब कोई राष्ट्र सुरक्षा के बदले अधीनता स्वीकार करने को तैयार न हो।
यह बदल रहा है।
भारत ने एफ-35 को ठुकरा दिया। भारत अपना स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रम विकसित कर रहा है। स्वदेशी डिजाइन। स्वदेशी उत्पादन। अमेरिकी स्पेयर पार्ट्स पर निर्भरता नहीं। अमेरिकी प्रतिबंधों से कोई भय नहीं। अमेरिकी कमान संरचना के अधीन नहीं। तत्काल जरूरत के लिए उसने फ्रांसीसी राफेल खरीदा। साथ ही रूसी एस-400 खरीदा और उसे स्वदेशी वायु रक्षा प्रणाली [Indigenous air defense system] आकाशतीर के साथ जोड़ा। अमेरिकी जेट इंजन के साथ उसके सहयोग का जिक्र पिछले अध्याय में हो चुका है।
तुर्की रूस की ओर बढ़ गया। तुर्की ने अमेरिकी पैट्रियट की जगह रूसी एस-400 वायु रक्षा प्रणाली खरीदी। अमेरिका ने प्रतिबंध लगाए। तुर्की ने जवाब में रूस से और गहरे संबंध बनाए और और अधिक खरीदा। महँगी बोतलें खुली नहीं रह गईं जबकि तुर्की ने दूसरे स्रोत ढूँढ लिए।
सऊदी अरब ने विविधता अपनाई। वह अभी भी अमेरिकी हथियार खरीदता है लेकिन तेजी से रूस और यूरोप से भी ले रहा है। जब अमेरिका ने कुछ हथियार प्रणालियाँ देने से इनकार किया तो सऊदी अरब ने दूसरी जगह देख ली। तेल के बदले सुरक्षा वाला संबंध जो कभी स्थायी लगता था, अब लेन-देन वाला हो गया और फिर टूट गया। सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता किया। ब्रिक्स में शामिल हुआ। अमेरिकी सुरक्षा छत्र [Security umbrella] पर निर्भरता कम की।
फिलीपींस ने झिझक दिखाई। फिलीपींस ने अमेरिका के साथ रक्षा समझौते किए लेकिन साथ ही चीन से संबंध भी गहरे किए। वह भारत से ब्रह्मोस मिसाइलें खरीदने की प्रक्रिया में है। जब अमेरिका ने विशेषाधिकार की माँग की तो फिलीपींस ने लचीलापन [Flexibility] चुना। जब दूसरे गिलास से पीने का विकल्प हो तो महँगी बोतलों की आकर्षकता खत्म हो जाती है।
पोलैंड ने दोनों तरफ से खेला। पोलैंड ने अमेरिकी हथियार खरीदे लेकिन स्वदेशी क्षमताएँ भी विकसित कीं। जब अमेरिका ने डिलीवरी में देरी की या शर्तें लगाईं तो पोलैंड ने वैकल्पिक व्यवस्था [Alternative arrangements] कर ली—कोरियाई प्रणालियाँ, यूरोपीय प्रणालियाँ—कोई भी जो अमेरिकी अनुमति की माँग न करे।
ब्राजील ने दूसरी जगह देखा। ब्राजील ने रूस, यूरोप और चीन से हथियार प्रणालियाँ तलाशीं। यह धारणा झूठी साबित हुई कि अमेरिका के पास सैन्य प्रौद्योगिकी का एकाधिकार है। जब अमेरिकी हथियारों के साथ राजनीतिक शर्तें, प्रतिबंधों की धमकी और संरेखण की माँगें जुड़ीं तो राष्ट्रों ने दूसरी जगह देख ली।
मिस्र ने अंतर को समझा। मिस्र अमेरिकी सैन्य सहायता पर निर्भर था लेकिन देख रहा था कि अमेरिका मानवाधिकार, क्षेत्रीय राजनीति और घरेलू प्राथमिकताओं के आधार पर शर्तें लगा रहा है। अमेरिकी साझेदारी की अनिश्चितता स्पष्ट हो गई। उसने फ्रांसीसी राफेल लड़ाकू विमान खरीदे। इस प्रकार मिस्र ने स्रोतों में विविधता लानी शुरू कर दी और रूस तथा खाड़ी देशों से संबंध गहरे किए।
छिपी हुई लागतें
वह 1580 अरब डॉलर की हथियार सूची सिर्फ शुरुआत है। एफ-35 कार्यक्रम बताता है कि वास्तव में क्या होता है। पेंटागन 2500 एफ-35 खरीदने की योजना बना रहा है, जिनकी कीमत लगभग 400 अरब डॉलर है। यह महँगा लगता है जब तक आप जान न लें कि उनके संचालन और रखरखाव के लिए अगले 1.27 ट्रिलियन डॉलर और खर्च करने की योजना है। यानी खरीद की तुलना में रखरखाव का अनुपात 3.2 : 1 है, जो शायद आशावादी है।
प्रत्येक एफ-35 का रखरखाव अभी सालाना 6.2 मिलियन डॉलर है। 30 वर्ष की सेवा अवधि में प्रति विमान रखरखाव पर अकेले 186 मिलियन डॉलर। इसमें ईंधन, उन्नयन, पायलट प्रशिक्षण और हैंगर सुविधाएँ शामिल नहीं हैं। सरकारी जवाबदेही कार्यालय चेतावनी दे रहा है कि रखरखाव लागत वर्तमान अनुमानों से अरबों अधिक हो सकती है।
यह पैटर्न हर जगह दोहराया जाता है। विमानवाहक पोतों को हर कुछ वर्षों में अरबों डॉलर के ओवरहाल [Overhaul - मरम्मत व कायाकल्प] की जरूरत पड़ती है। परमाणु पनडुब्बियों को रिएक्टर ईंधन भरने में सैकड़ों मिलियन डॉलर प्रति नाव लगते हैं। टैंकों को भी निरंतर उन्नयन, इंजन मरम्मत और आधुनिकीकरण कार्यक्रमों की जरूरत होती है।
किसी भी सैन्य प्रणाली को बनाने से पहले उसे आविष्कार करना पड़ता है। जैसा पहले कहा गया, एफ-35 ने एक भी परिचालन विमान बनाने से पहले लगभग 70 अरब डॉलर शोध और विकास [Research and Development - R&D] पर खर्च किए। एफ-22 रैप्टर का विकास 40 अरब डॉलर का पड़ा। बी-2 स्पिरिट बमवर्षक के लिए सिर्फ इक्कीस विमानों के लिए 23 अरब डॉलर शोध और विकास में लगे।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका ने रक्षा शोध और विकास [Research and Development - R&D] पर अनुमानित दो से तीन ट्रिलियन डॉलर खर्च किए हैं। डार्पा अकेले 1958 से अब तक 200 अरब डॉलर से अधिक खर्च कर चुका है। गुप्त कार्यक्रम, उपग्रह विकास, परमाणु हथियार शोध, विशेष अभियान क्षमताएँ जोड़ लें तो शोध और विकास [R&D] का बिल वर्तमान हथियार सूची मूल्य से भी अधिक हो जाता है।
वास्तविक लागत—इस बल को बनाने, संचालित करने और उसकी पूरी आयु तक बनाए रखने के लिए सब कुछ जोड़कर—30 ट्रिलियन डॉलर के करीब पहुँचती है। यह टाइपो नहीं है। यही विश्व की एकमात्र वैश्विक सैन्य महाशक्ति होने की कीमत है।
वे बोतलें जिन्हें कोई नहीं चाहता
आधुनिक सैन्य प्रणालियाँ अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी और अत्यधिक प्रदर्शन आवश्यकताओं को जोड़ती हैं। एक एफ-35 लड़ाकू विमान को विमानवाहक पोत, सामान्य रनवे और छोटे हेलीकॉप्टर उतार क्षेत्रों से संचालित होना चाहिए। इसमें अदृश्यता क्षमता, उन्नत सेंसर, नेटवर्क कनेक्टिविटी, हवा और जमीन दोनों लक्ष्यों पर हमला करने की क्षमता होनी चाहिए। हर आवश्यकता जटिलता और लागत बढ़ाती है।
सैन्य ठेकेदारों के सामने अनोखी चुनौतियाँ हैं। वे छोटी मात्रा में अत्यधिक विशेष उपकरण बनाते हैं। परमाणु पनडुब्बियों या सामरिक बमवर्षकों का कोई नागरिक बाजार नहीं है। गुणवत्ता की माँगें व्यावसायिक मानकों से कहीं ऊपर हैं क्योंकि असफलता का मतलब जानें जाना और मिशन विफल होना है।
अमेरिका ने दशकों तक वैश्विक सैन्य प्रभुत्व बनाए रखा—अपने सहयोगियों को अमेरिकी हथियारों पर निर्भर बनाकर। यह रणनीति काम करती रही। फिर कुछ बदल गया। साझेदारों ने समझ लिया कि वे अपनी क्षमताएँ खुद बना सकते हैं। या रूस, यूरोप, चीन या भारत से बिना शर्तों के खरीद सकते हैं। या स्वदेशी उद्योग विकसित कर सकते हैं बजाय हमेशा अधीन रहने के।
महँगी बोतलें अब बोझ बन गई हैं। उन्हें निरंतर रखरखाव चाहिए। वे विशेष निष्ठा की माँग करती हैं। वे साझा करने की कोई आपसी व्यवस्था नहीं देतीं।
खाली घर
अमेरिका अपनी सैन्य शक्ति को महँगी बोतलों की तरह प्रदर्शित करता है। ग्यारह वाहक समूह। 13,000 विमान। 3700 परमाणु वारहेड। लेकिन जब साझेदारों को वास्तविक सहयोग की जरूरत पड़ती है तो अमेरिका अधीनता पेश करता है। परिणाम वही पैटर्न दोहराता है। अमेरिका अपना 850 अरब डॉलर का वार्षिक सैन्य बजट अकेले खर्च करता है। अन्य राष्ट्र अमेरिकी मदद के बिना साझेदारियाँ बना रहे हैं।
प्रदर्शन बिना साझा किए कोई स्थायी संबंध नहीं बनाता। रिश्तेदार इसे लॉकडाउन के दौरान सीख सकता था। लेकिन न तो उसने सबक सीखा और न ही अमेरिका सीखेगा, भले ही गठबंधनों का विघटन हो रहा हो। महँगी बोतलें वर्षों तक खुली नहीं रही। फिर अकेले में खप गईं। अमेरिका की सैन्य शस्त्रागार का भी यही भविष्य है। संसाधन बिना संबंधों के अकेलेपन के बराबर हैं। प्रभावशाली आँकड़े मूलभूत अकेलेपन को छिपाते हैं।
साम्राज्यों का अंत इसी तरह होता है। बड़े धमाके से नहीं। चुपचाप छोड़ दिए जाने से। साझेदार मदद माँगना बंद कर देते हैं। वे अपनी विकल्प व्यवस्थाएँ बना लेते हैं। वे दूसरे आपूर्तिकर्ताओं से खरीदते हैं। वे स्वदेशी क्षमताएँ विकसित कर लेते हैं। साम्राज्य अपनी सावधानी से तैयार की गई श्रेष्ठता को घुलते देखता रहता है।
रिश्तेदार ने अपने खाली घर में अच्छी स्कॉच बर्बाद की। अमेरिका अच्छा पैसा बिना इस्तेमाल के हथियारों पर बर्बाद कर रहा है। यह पैटर्न पूरे इतिहास में दोहराया जाता है। हर साम्राज्य सोचता है कि उसका प्रदर्शन हमेशा टिकेगा। हर साम्राज्य को पता चलता है कि संबंध संसाधनों से ज्यादा मायने रखते हैं। हर साम्राज्य बहुत देर से सीखता है। गणित सरल है। अकेलेपन प्लस संसाधन बराबर बर्बादी। संबंध प्लस सहयोग बराबर समृद्धि। हर साम्राज्य को यह विकल्प मिलता है। अधिकांश गलत चुनते हैं। व्हिस्की खत्म हो गई। बोतलें खाली हैं। मित्र कभी वापस नहीं आते। यही दिखावे को प्रामाणिकता से ऊपर चुनने की कीमत है। यही महाशक्तियाँ मात्र स्मृतियाँ बन जाने का तरीका है।
यह कहानी उस रिश्तेदार के बारे में नहीं है। यह साम्राज्यवादी मनोविज्ञान [Imperial psychology] के बारे में है। यह घमंड की कीमत के बारे में है। यह उस स्थिति के बारे में है जब प्रदर्शन साझा करने से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। साम्राज्य भी इसी तरह गिरते हैं। एक संबंध टूटने से। एक टूटे वादे से। एक न खुली हुई बोतल से। जब तक वे अपने खजाने के साथ अकेले न बैठ जाएँ। महँगी व्हिस्की खाली कमरों में पीते हुए। सोचते हुए कि सब कहाँ चले गए। जवाब सरल है। वे वहाँ चले गए जहाँ वे एक साथ पी सकते थे।
यह कहानी उस रिश्तेदार के बारे में नहीं है। यह साम्राज्यवादी मनोविज्ञान [Imperial psychology] के बारे में है। यह घमंड की कीमत के बारे में है। यह उस स्थिति के बारे में है जब प्रदर्शन साझा करने से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। साम्राज्य भी इसी तरह गिरते हैं। एक संबंध टूटने से। एक टूटे वादे से। एक खुली न हुई बोतल से। जब तक वे अपने खजाने के साथ अकेले न बैठ जाएँ। महँगी व्हिस्की खाली कमरों में पीते हुए। सोचते हुए कि सब कहाँ चले गए। जवाब सरल है। वे वहाँ चले गए जहाँ वे एक साथ पी सकते थे।
अमेरिका के सैन्य बजट में अभी कोई कटौती नहीं हुई है। यह आज भी आठ सौ अरब डॉलर से ऊपर बना हुआ है। यह स्थिति अत्यधिक तनाव वाली लगती है।
अगले अध्याय में हम देखेंगे कि क्या अमेरिका उसी प्रकार तनाव में है, जिस प्रकार 1940 के दशक में ब्रिटिश साम्राज्य तनावग्रस्त हो गया था।
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