भूमिका
चलिए मैं आपसे कुछ सवाल पूछता हूँ। दुनिया का सबसे अमीर देश कौन सा है? इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि आपके सवाल का असली मतलब क्या है। अगर हम वहां के नागरिकों की बात करें, तो वह अमीर देश अमेरिका नहीं, बल्कि प्रति व्यक्ति जीडीपी (GDP per capita) के हिसाब से स्विट्ज़रलैंड है। लेकिन अगर आप पूरे देश की बात करें, तो अमेरिका की जीडीपी (GDP) दुनिया में सबसे बड़ी है।
पर क्या आप जानते हैं कि अमेरिका की आधी आबादी बड़ी मुश्किल से गुज़ारा कर पाती है? वे शानदार तरीके से निर्धन हैं? नहीं जानते? चलिए, हम आगे इस पर विस्तार से बात करेंगे।
अमेरिका का जन्म क्यों हुआ था? वह ब्रिटिश साम्राज्य से लड़ने और उसका विरोध करने के लिए बना था। अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम ब्रिटिश के विरुद्ध एक युद्ध था।
तो फिर आज अमेरिका हमेशा किसी न किसी जंग में—चाहे सीधे तौर पर या पर्दे के पीछे से—क्यों उलझा रहता है? वह अभी किसके लिए लड़ रहा है? आपके पास इसके लिए अपने कुछ मनपसंद जवाब हो सकते हैं, जैसे "लोकतंत्र की रक्षा", "मानवीय मूल्य" या ऐसी ही कोई और बात। लेकिन यकीन मानिए, ऐसे जवाब सच से कोसों दूर हैं।
इराक, लीबिया, ईरान, वेनेज़ुएला और रूस में क्या एक जैसी बात थी?
आप कह सकते हैं कि ये वो देश हैं जो अमेरिका से भिड़ गए। आप बिल्कुल सही होंगे। लेकिन यह पूरा जवाब नहीं है। आप यह भी कह सकते हैं कि इन सभी देशों के पास तेल के कुएं हैं। तब भी आप सही होंगे, लेकिन फिर भी आप असली निशाने से चूक रहे हैं। असल में इन सभी देशों में जो एक बात समान थी, वो यह कि इन सब ने मिलकर दुनिया भर की करेंसी की कीमतें तय करने वाले सिस्टम को सीधी चुनौती देने की कोशिश की थी। और मज़े की बात यह है कि ज़्यादातर लोगों को इसका मतलब तक नहीं पता।
अब आप ही बताइए कि रूस, चीन, ब्राज़ील और भारत में क्या समानता है? इस बार मैं जवाब नहीं दूँगा। अब आप खुद समझदार हैं। इसका सीधा सा जवाब है—ब्रिक्स (BRICS)।
वह सवाल जो कोई नहीं पूछता
जब आप टीवी समाचारों में अंतरराष्ट्रीय विवादों और जंग की बातें सुनते हैं, तो आपको घिसे-पिटे तर्क सुनाई देते हैं: "लोकतंत्र को फैलाना", "आतंकवाद का सफाया करना", "परमाणु हथियारों को रोकना" या "मानवाधिकारों की रक्षा करना"। लेकिन यहाँ एक ऐसा सवाल है जो शायद ही कभी टीवी पर पूछा जाता है—
आखिर यह कौन तय करता है कि एक डॉलर के मुकाबले एक यूरो, एक युआन या किसी भी दूसरी करेंसी की क्या कीमत होगी?
करेंसी बाज़ार के उतार-चढ़ाव को देखकर ज़्यादातर लोग यही मानते हैं कि यह बाज़ार के प्राकृतिक नियमों से तय होता है। डिमांड और सप्लाई, यही ना? अर्थशास्त्र का वह अदृश्य हाथ (Invisible Hand)? लेकिन यह सोचना बिल्कुल गलत है।
पूरी दुनिया में करेंसी की कीमतें केवल दो कंप्यूटर प्लेटफॉर्म्स से तय होती हैं। सिर्फ दो! और इन प्लेटफॉर्म्स को मुट्ठी भर अमेरिकी फाइनेंशियल कंपनियां ही कंट्रोल करती हैं। हर प्लेटफॉर्म अलग-अलग करेंसी जोड़ों (जैसे डॉलर-रुपया, डॉलर-यूरो) का काम देखता है। घूम-फिरकर बात सिर्फ एक ही प्लेटफॉर्म पर आकर टिक जाती है। सीधे शब्दों में कहें, तो ये कंप्यूटर मशीनें करेंसी के बहाव को कंट्रोल करती हैं, और इस तरह वे मांग और कीमतों को भी अपने काबू में रखती हैं।
इस किताब में आप आगे जो कुछ भी पढ़ने वाले हैं—चाहे वह कोई युद्ध हो, आर्थिक प्रतिबंध हों, जबरन सरकारें पलटने का खेल हो या परमाणु हथियारों का खतरा—वह सब इस एक सीधे से सच को समझते ही शीशे की तरह साफ हो जाएगा। अमेरिका ने किसी एक सुबह सोकर उठने के बाद दुनिया पर राज करने का कोई फैसला नहीं किया था। बल्कि हुआ यह कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका के पास एक बहुत बड़ी औद्योगिक ताकत (फैक्ट्रियां और प्रोडक्शन) बची थी, जबकि दुनिया के बाकी देश जंग की तबाही के मलबे से खुद को दोबारा खड़ा करने में जुटे थे। इसके बाद, कई इत्तफाकों और चालाकी भरे कदमों की वजह से अमेरिका उस पूरे नेटवर्क और सिस्टम पर अपना कब्ज़ा जमाने में कामयाब हो गया जो दुनिया भर की करेंसी की कीमतें तय करता है।
इसके बाद जो कुछ भी हुआ, वह होना ही था। एक बार जब आप दुनिया भर के पैसों के लेन-देन को अपने कंट्रोल में ले लेते हैं, तो बाकी हर तरह की ताकत और असर अपने आप आपके पीछे खिंचे चले आते हैं। फिर आपको देशों पर फौज चढ़ाकर उन्हें जीतने की कोई ज़रूरत नहीं रह जाती। आपको बस इतना करना होता है कि दुनिया आपके बनाए गए इसी सिस्टम का इस्तेमाल करती रहे।
लेकिन इस अपार ताकत का इस्तेमाल आम अमेरिकी नागरिकों की ज़िंदगी को बेहतर बनाने के बजाय, केवल इस साम्राज्य की हिफाज़त करने में फूंक दिया गया। और यह अजेय नहीं है। कोरोना महामारी ने इसकी कमजोरियों को खोलकर रख दिया। अफगानिस्तान में तालिबान ने इसे ठेंगा दिखा दिया। रूस को यूक्रेन में युद्ध शुरू करने से यह सिस्टम नहीं रोक पाया। चीन ने जब अमेरिका से सोयाबीन खरीदना कम किया और ज़रूरी खनिज (Rare Earth Minerals) देने से मना करने की धमकी दी, तो अमेरिका उसे टैक्स बढ़ाने की धमकियों से झुका नहीं सका। सोमालिया के लोगों ने इसे पूरी तरह नजरअंदाज किया, और यमन के हूतियों ने अमेरिकी जहाजों पर सीधे हमले करके उन्हें अदन की खाड़ी से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
आज अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियां सूचनाओं (इनफॉर्मेशन) के बहाव को कंट्रोल करने वाली सबसे बड़ी ताकत बन चुकी हैं। उनका मुनाफा दुनिया के कई देशों की कुल जीडीपी (GDP) से भी ज़्यादा है। दुनिया के इतिहास में ऐसा कभी नहीं देखा गया। यह सब मुमकिन हुआ क्योंकि अमेरिका ने ब्याज दरों को लगभग ज़ीरो पर रखकर दुनिया में डॉलर की अंधाधुंध सप्लाई कर दी थी।
लेकिन जो साम्राज्य हादसों और इत्तफाकों से पैदा होते हैं, वे उतनी ही आसानी से ढह भी सकते हैं। आज हम उसी रास्ते पर खड़े हैं। अब सवाल यह नहीं है कि "क्या अमेरिकी साम्राज्य का पतन होगा?", बल्कि असली सवाल यह है कि "यह पतन कब होगा?"—और यही वह सवाल है जिसका जवाब आज किसी के पास नहीं है।
लेकिन मैं आपको दिखाऊँगा कि इस पतन की शुरुआत अखबारों में छपने वाली खबरों से कहीं ज़्यादा साफ और बड़ी है। इस किताब के पन्नों में आप पढ़ेंगे—
अमेरिका को बनाने वाले उन नेताओं के बारे में जो कोई सरकार तो क्या, एक साम्राज्य खड़ा करने की सोच के भी सख्त खिलाफ थे। अमेरिका के उस अतीत के बारे में जो आज उसके गले की हड्डी बन चुका है। उन परमाणु हथियारों के बारे में जिन्होंने अनजाने में डॉलर की दादागिरी खड़ी करने में मदद की। उन तेल के युद्धों के बारे में जो असल में तेल के लिए लड़े ही नहीं गए थे। उन स्पेस प्रोग्राम्स (अंतरिक्ष मिशनों) के बारे में जो सिर्फ डॉलर के इस सिस्टम की रक्षा के लिए शुरू किए गए थे। यूनिवर्सिटी और कॉलेजों के बारे में जो आज खुद को बर्बाद करने वाले आर्थिक नियम पढ़ा रहे हैं। उन क्रांतियों के बारे में जो जैसी दिखाई गईं, असल में वैसी थीं नहीं। अमेरिका की उन ढीली-ढाली नीतियों के बारे में जिनमें अब कोई दम नहीं बचा है। और रूस, चीन तथा भारत के उभार के बारे में, जो मिलकर अब डॉलर के मुकाबले एक नया आर्थिक सिस्टम खड़ा करने में जुटे हैं।
वैसे तो हर चैप्टर आपको एक अलग कहानी जैसा लगेगा, लेकिन ये सब आपस में एक अदृश्य धागे से बंधे हुए हैं। वह धागा है—दुनिया की करेंसी पर कब्ज़ा करने और अपने साम्राज्य को बचाए रखने की जंग। एक बार जब आप उस धागे को पकड़ लेते हैं, तो फिर आप उसे कभी नजरअंदाज नहीं कर पाएंगे। फिर आपको टीवी और अखबारों में आने वाली हर खबर का एक बिल्कुल नया मतलब समझ आने लगेगा।
इस किताब को खत्म करते-करते आप अच्छी तरह समझ जाएंगे कि कुछ देश बार-बार अमेरिका के निशाने पर क्यों आ जाते हैं, और इसका लोकतंत्र से कोई लेना-देना नहीं है। आप जान पाएंगे कि कैसे लंदन और शिकागो के दो कंप्यूटर प्लेटफॉर्म्स इतिहास के किसी भी राजा या सम्राट से कहीं ज़्यादा दौलत को कंट्रोल करते हैं। आप समझ पाएंगे कि आपके रसोई गैस के दाम, राशन का बिल और बिजली का खर्च हज़ारों मील दूर चल रही भू-राजनीतिक लड़ाइयों से कैसे जुड़े हुए हैं। आप देखेंगे कि कैसे "बेहतर टेक्नोलॉजी" के नाम पर शुरू हुआ एक सिस्टम देखते ही देखते दुनिया को काबू करने का सबसे बड़ा हथियार बन गया। आप जान पाएंगे कि आज उत्तरी ध्रुव (North Pole) जैसी जगहों पर संसाधनों के लिए इतनी बड़ी होड़ क्यों मची है, और अमेरिकी साम्राज्य क्यों बिखर रहा है तथा इसकी जगह कौन ले सकता है।
एक अलग तरह का इतिहास
यह आमतौर पर लिखी जाने वाली इतिहास की कोई किताब नहीं है। हम घटनाओं को तारीखों और सालों की कतार में नहीं देखेंगे, न ही इस बात पर बहस करेंगे कि कौन सा राष्ट्रपति अच्छा इंसान था और कौन सा बुरा। चेहरा और व्यक्तित्व यहाँ मायने नहीं रखते, मायने रखते हैं उनके द्वारा लिए गए फैसले।
हम मुख्य रूप से पिछली एक सदी (100 साल) के भीतर घटी कुछ खास घटनाओं को एक साथ रखकर जांचेंगे, हालांकि कभी-कभी हमें थोड़ा और पीछे इतिहास में भी जाना पड़ेगा। मेरी कोशिश यही रही है कि इस किताब की भाषा को बातचीत जैसी (संवादात्मक) रखा जाए, लेकिन कुछ अध्यायों में यह थोड़ी जटिल या उबाऊ लग सकती है। ऐसे हिस्सों को आप चाहें तो छोड़ सकते हैं और बाद में पढ़ सकते हैं। लेकिन जब आप पूरी किताब पढ़ लेंगे, तो आपको यह सारा खेल बहुत दिलचस्प लगेगा।
बड़े-बड़े एक्सपर्ट्स अपनी नौकरियों और रुतबे को बचाए रखने के लिए अक्सर सीधी-सरल बातों को भी बहुत उलझाकर पेश करते हैं। लेकिन यह किताब किसी अकादमिक नाटक के बिना, आपके सामने कड़वी सच्चाई को सीधे रखती है। आंकड़े और तथ्य कभी झूठ नहीं बोलते, बशर्ते आप उनके बोलने की भाषा को समझ सकें।
हम यहां उस अदृश्य सिस्टम को देखेंगे जो हमारी आंखों के ठीक सामने छिपा हुआ है और जिससे आज की आधुनिक दुनिया चल रही है। यह वो ढांचा है जिसे ज़्यादातर लोग कभी देख नहीं पाते, लेकिन जो उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी के हर हिस्से पर असर डालता है। पिछले कुछ सालों में हमने "डीप स्टेट" (Deep State) शब्द बहुत बार सुना है। लोगों को लगता है कि यह शायद कोई गुप्त सरकार है। लेकिन ऐसा नहीं है। यह सिर्फ उन लोगों के निजी फायदों का गट्ठर है जो इस सिस्टम को वैसा ही बनाए रखना चाहते हैं जैसा वह आज है (यथास्थिति) और उसमें रत्ती भर भी बदलाव नहीं चाहते।
हम पैसे का पीछा करेंगे। उस पैसे का नहीं जो आप अपनी जेब में देखते हैं, बल्कि उस अदृश्य दौलत का जो ऐसे रास्तों से होकर बहती है जिनके बारे में ज़्यादातर लोगों को खबर तक नहीं है। इसे समझना सिर्फ किताबी ज्ञान पाना नहीं है, बल्कि यह उस खेल को समझने की चाबी है जिससे आज की दुनिया चल रही है और आगे यह किस तरफ जा रही है।
तो चलिए शुरू करते हैं। आइए, मानव इतिहास के सबसे शक्तिशाली और हमारी आँखों के ठीक सामने छिपे इस साम्राज्य का पर्दाफाश करें। एक बार जब आप इस खेल को समझ लेंगे, तो फिर कभी दुनिया को पुराने नज़रिए से नहीं देख पाएंगे।
एक ऐसा साम्राज्य जिसकी पहले से किसी ने कोई प्लानिंग नहीं की थी, जिसे ज़्यादातर लोग देख भी नहीं पाते, और जो शायद अगले दस सालों से ज़्यादा नहीं टिकने वाला।
अमेरिकी साम्राज्य की कहानी में स्वागत है। हम बिल्कुल शुरुआत से शुरू करेंगे। यह जानना सबसे ज़रूरी है कि अमेरिका की स्थापना कैसे हुई थी और इसे बनाने के पीछे क्या मकसद थे।
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